Thursday, July 25, 2024

  भारतीय दर्शन एवं आगमशास्त्र की साधना पद्धतियों में तन्त्र शब्द का व्यापक प्रयोग हुआ है। आगमशास्त्र वस्तुतः अत्यन्त गम्भीर चिन्तन व वैज्ञानिक प्रक्रिया के अन्तर्गत है, परन्तु जिस शास्त्र का विशेष साधना एवं साधना पद्धति के रूप में प्रयोग हुआ है वह साधना के एक व्यापक आयाम में प्रयुक्त हुआ है और वर्तमान में उसके जो भेद दिखाई पड़ते है वे बाद के हैं। आगमशास्त्र एक वैज्ञानिक पद्धति है जो विभिन्न देवताओं का अवलम्बन करके परम तत्व तक पहुँचने का द्वार खोलती है। आगमशस्त्र में जो विविध रूपात्मकता दिखाई पड़ती है इसका मुख्य कारण है कि चूँकि मनुष्य रूपवान है इसलिए प्रथमतः रूप का माध्यम ग्रहण करना साधना में विकास के लिए सुविधाजनक और सरल है। वस्तुतः आगमशस्त्र अरूप की यात्रा का लक्ष्य प्रदर्शित करता है और निराकार तक पहुँचने के लिए यात्रा पथ के रूप में कार्य करता है, अतः आगमशास्त्र रूप के माध्यम से अरूप तक पहुँचने की एक विशिष्ट साधना पद्धति है जो सनातन साधना पद्धतियों में सर्वत्र व्याप्त है। भारतीय दर्शन एवं आगमशास्त्

तन्त्र का शब्दिक अर्थः- तन्त्र का उच्चारण करने से रूढ़-रूप में एक विशेष पद्धति का बोध होता है और वह पद्धति साधना की है। इस पद्धति की विवेचना से पूर्व तन्त्र की व्युत्पत्ति का ज्ञान अति आवश्यक है। तन्त्र शब्द की व्युत्पत्ति ‘तनु’ धातु से हुई है। ‘तनु’ का अर्थ है विस्तार करना। ‘तनोति विस्तारयति ज्ञानं येन यस्मात् वा तत् तन्त्रम्, अथवा तन्यते विस्तारयते ज्ञानं अनेन इति तन्त्रम्।

व्याकरण के दृष्टिकोण से ‘तनु’ धातु के साथ त्रयीधातु का भी योग है जिससे एक अर्थ इसमें जुड़ जाता है- रक्षा करने का अर्थात् तन्त्र ज्ञान का विस्तार तो करता ही है साथ ही रक्षा भी करता है। इससे स्पष्ट है कि तन्त्र साधक को आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों से छुटकारा दिलाता है तथा भय-मुक्त भी करता है। ‘तनोति विपुलानर्थान् तन्त्रमन्त्राणि समन्वितान्। त्राणं च कुरूते यस्मात्तन्त्रमित्यभिधीयते।। तन्त्रम्-इति-अभिधीयते।

तन्त्र की व्यापकता/विशिष्टता के कारण प्राचीन काल में शास्त्र और विज्ञान को भी तन्त्र कहा जाता था। न्याय, सांख्य और योगशास्त्र को भी अनेक स्थानों पर तन्त्र शब्द से प्रदर्शित किया गया है। आयुर्वेद शास्त्र के अनेक उपखंडों के नाम में तन्त्र शब्द का जुड़ाव देखने को मिलता हहै जैसे शल्य तन्त्र, शालाक्य तन्त्र।

परन्तु यहाँ पर जिस तन्त्र से तात्पर्य है वह एक विशेष पद्धति तथा विशेष दर्शन है। तन्त्र का ही शास्त्रीय नाम आगम है और आगम को वेद की भाँति ही मान्यता प्राप्त है। आगम इसलिए भी तन्त्र को कहा जाता है क्योंकि तन्त्र ग्रन्थों में प्रायः वक्ता देवाधिदेव शिव हैं और श्रोता जगत्जननी भगवती पार्वती, कहीं-कहीं इसके विपरीत भी है जहां वक्ता मां पार्वती और श्रोता महादेव शिव है। आगमशास्त्र में सृष्टि, प्रलय, देवतार्चन, मन्त्रों की साधना, पुरश्चरण, षट्कर्म, ध्यान-योग आदि समस्त विषयों पर अत्यन्त गंभीरतापूर्वक विचार किया गया है। 

आगम शास्त्र में इस बात का भी उल्लेख आया है कि कलियुग में आगम साधना ही प्रभावकारी तथा सिद्धिदात्री हो सकती है। ”प्रपंचसार तन्त्र“ का मत है कि सत-युग में श्रुतियों के अनुसार त्रेता-युग में स्मृतियों के अनुसार, द्वापर-युग में पुराणों के अनुसार एवं कलियुग में आगमशास्त्र के अनुसार ही धर्म की सार्थकता होती है। 

महानिर्वाण तन्त्र इस बात की घोषणा करता है कि कलियुग में आगम-मार्ग के अतिरिक्त मुक्ति पाने का दूसरा मार्ग नहीं है। शिव के मुख से बताया गया है कि- कलि-युग में जो व्यक्ति आगमशास्त्र का मार्ग त्याग कर अन्य साधना करता है, उसकी गति कदापि संभव नहीं है, यह सर्वथा सत्य है और इसमें तनिक सन्देह नहीं है। 

आगम साहित्यः- आगमशास्त्र में शिव के पाँच मुख हैं जो तन्त्र में प्रतीक रूप में गृहण किए गए हैं। यही प्रकारान्तर से आम्नाय का रूप धारण करते हैं। निष्कल शिव सर्वप्रथम नाद के रूप में उद्भासित होते हैं और बिन्दु के स्वरूप को उद्भासित करते हुए आगे के विकास क्रम को प्रदर्शित करते हैं। कामिकागम के अनुसार सदाशिव के प्रत्येक मुख से पाँच श्रोतों का निर्गमन हुआ है वे श्रोत हैं- लौकिक, आध्यात्मिक, वैदिक, अतिमार्ग और मन्त्रात्मक। इस प्रकार शिव के पाँच मुख होने से श्रोतों की संख्या 25 हो जाती है। विभिन्न तन्त्र ग्रन्थों में इसका वर्णन प्राप्त है। मन्त्रात्मक तन्त्र भी पांच प्रकार के हैं। शिव के मुख पाँच होने से इनकी संख्या भी पाँच होती है और तन्त्र ग्रन्थों में आम्नाय शब्द से इन्हें बताया गया है। आम्नायों के नाम हैं- ऊर्ध्वाम्नाय, पूर्वाम्नाय, पश्चिमाम्नाय, दक्षिणाम्नाय और उत्तराम्नाय। ऊर्ध्व-मुख से उत्पन्न ‘मुक्ति देने वाला’, पूर्व मुख से उत्पन्न ‘सर्वविषों को हरने वाला’, उत्तर मुख से उत्पन्न ‘वशीकरण करने वाला’, पश्चिम मुख से उत्पन्न ‘भूत-पिशाच ग्रह निवारण करने वाला’, तथा दक्षिण मुख से उत्पन्न ‘शत्रुओं पर विजय दिलाने वाला’ है। इसका विस्तृत विवरण ‘कामिकागम’ में दिया गया है। 

आगमशास्त्र के विषय में उल्लेखनीय है कि कोई भी मंत्र प्रयोग बिना योग्य गुरू के निर्देशन के नहीं करना चाहिए, पुस्तकों/समाचारपत्रों में पढ़ कर या टेलीविजन पर देख कर भी इनके प्रयोग कदापि नहीं करने चाहिए। इसका कारण यह है कि समाचारपत्रों में या टेलीविजन में जो लोग आगमशास्त्रीय मंत्रों को करने की सलाह देते नजर आते हैं वे भी तंत्र के मर्म को नहीं जानते हैं और पुस्तकों में उनकी फलश्रुति पढ़ कर बताने लगते हैं जिनके करने से लाभ तो दूर, हानि की सम्भावनाएं प्रबल हो जाती हैं, क्योंकि आगमशास्त्र में काफी जटिलताएं हैं। आगमशास्त्र के अनुसार एक मंत्र किसी के लिए लाभदायक हो सकता है वहीं दूसरी ओर वही मंत्र दूसरे व्यक्ति के लिए अनिष्टकारक हो सकता है। प्रत्येक व्यक्ति का अपना ‘कुल’ होता है, कुल के विपरीत मंत्र का प्रयोग सदैव कष्टदायी होगा, इसमें रंचमात्र सन्देह नहीं है। अतः आगमशास्त्र के मंत्रों के प्रयोग से पूर्व ‘अ क ड म’, ‘अष्ट दल महा पद्म चक्र’, ‘पद्म महा चक्र’, ‘कुलाकुल चक्र’, ‘तारा चक्र’, ‘गण विचार’, ‘राशि चक्र’, ‘कूर्म चक्र’, ‘शिव चक्र’, ‘विष्णु चक्र’, के द्वारा ‘मंत्र का शोधन या तो स्वयं कर लेना चाहिए अथवा कि आगमशास्त्र के जानकार से करवा लेना चाहिए। आगमशास्त्र की विधियों का पूर्णरूपेण पालन करते हुए जब ‘मंत्र सिद्धि’ की जाती है तब निःसन्देह साधक की मनोकामना की पूर्ति होती है।      

तन्त्र ग्रन्थों में तन्त्र की संख्या का उल्लेख मिलता है, पर उनमें भिन्नता पायी जाती है, ‘श्री कण्ठ संहिता’, ‘वामकेश्वर तन्त्र’ आदि तन्त्र ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों की संख्या मिलती है, और ‘रथकान्ता’, ‘विष्णुकान्ता’, और ‘अश्वकान्ता’, में भी चौंसठ तन्त्रों का विवरण मिलता है, परन्तु चौसठ तन्त्रों के नामों में कुछ भेद भी मिलता है। ‘वामकेश्वर तन्त्र’ के अनुसार चौंसठ-तन्त्रों के नाम निम्नलिखित हैं-

(1) गणेशयामल (2) रूद्रयामल (3) महाकालीमत (4) लक्ष्मीयामल (5) उमायामल (6) स्कन्दयामल  (7) जयद्रथयामल  (8) महालक्ष्मीमत (9) कौमारी (10) वैष्णवी (11) वाराही (12) माहेन्द्री (13) चामुण्डा (14) शिवदूती (15) ब्रह्मयामल 16) विष्णुयामल (17) शम्बर (18) जालशम्बर (19) तत्वशम्बर (20) भैरवाष्टक (21) महामाया (22) ब्राह्मी (23) चन्द्रज्ञान (24) वासुकी (25) महासंमोहन (26) महोच्छुष्म (27) वातुल (28) वातुलोत्तर (29) हृद्भेद (30) तन्त्रभेद (31) गुह्य तन्त्र (32) कामिक (33) कलावाद (34) कलासार (35) कुब्जिकामत (36) तन्त्रोत्तर (37) चीनाख्य (38) तोडल (39) तोडलोत्तर (40) पंचामृत (41) वीरावली (42) सर्वज्ञानोत्तर (43) कुलसार (44) कुलोड्डीश (45) कुल चूड़ामणि (46) भूतडामर (47) योगिनी (48) माहेश्वरी (49) विशुद्धेश्वर तन्त्र (50) कुरुपिकामत (51) रूपिकामत (52) सर्ववीरमत (53) विमलामत (54) पूर्वाम्नाय (55) पश्चिमाम्नाय (56) दक्षिणाम्नाय (57) उत्तराम्नाय (58) ऊर्ध्वाम्नाय (59) वैशेषिक मत (60) ज्ञानार्णव (61) रूप भेद (62) अरूणेश (63) मोहिनीश (64) सिद्धयोगेश्वरीमत।

उल्लेखनीय है कि भिन्न-भिन्न आगम ग्रन्थों में चौंसठ तन्त्रों के नाम आते हैं उनमें संख्या तो 64 ही रहती है परन्तु नामों में अन्तर आ जाता है। मुख्यतः इसका विवरण श्री कण्ठ संहिता, वामकेश्वर तन्त्र, भास्करराय सम्मत सर्वोल्लास तन्त्र, तोडलोत्तर तन्त्र, महासिद्धिसार तन्त्र आदि में मिलता है। 

आदि गुरू शंकराचार्य ने सौन्दर्य लहरी में चौंसठ तंत्रों की संख्या का उल्लेख किया है। चौंसठ की संख्या शायद शिव द्वारा अभिमत चौंसठ वर्णों की निर्देशिका हो सकती है। यह अनुमान है कि विभिन्न मतों तथा विभिन्न कालों में भिन्न-भिन्न तंत्रों का निर्माण हुआ। वर्तमान में सभी तंत्र ग्रन्थ उपलब्ध नहीं होते हैं फिर भी जो प्राप्त हैं उनकी संख्या पर्याप्त है। इसके अतिरिक्त पीठ, भैरव तथा यामल के आधार पर तंत्रों के नाम उपलब्ध होते हैं। पीठ के अनुसार विद्यापीठ, मंत्रपीठ, मुद्रापीठ और मंडल पीठ हैं, जो वस्तुतः तंत्रों के ही भेद हैं। पीठ से सम्बन्धित तंत्रों के नाम इस प्रकार हैं - लाकिनी कल्प, योगिनी जाल, योगिनी हृदय इत्यादि। भैरवों के नामानुसार तंत्रों के जो नाम हैं वे हैं- स्वच्छन्द भैरव, क्रोध भैरव, उन्मत्त भैरव, उग्र भैरव, कपाल भैरव, झंकार भैरव, शेखर भैरव और विजय भैरव आदि। यामल के अनुसार यामलों के आठ नाम हैं- ब्रह्म यामल, विष्णु यामल, रूद्र यामल, कुबेर यामल, स्कन्द यामल, यम यामल, वायु यामल और इन्द्र यामल। इन यामलों के नामों में कहीं-कहीं नामान्तर भी मिलता है। संमोहन तंत्र में कहा गया है कि चीन में 100 मूल तंत्र और 37 उपतंत्र है। द्रविड़ में 20 मूल और 25 उपतंत्र हैं। केरल में 60 मूलतंत्र और 500 उपतंत्र हैं। काश्मीर में 100 मूलतंत्र और 10 उपतंत्र है तथा गौड़ में 27 मूलतंत्र और 16 उपतंत्र हैं। शैव, वैष्णव, गाणपत्य और सौर-भेद से इनकी संख्या में और भी अधिकता आ जाती है। 

शाक्त तंत्रों में उपास्य देवताओं के अनुसार भी तंत्र ग्रन्थों में विभाग है। इस दृष्टि से काली, तारा, श्री विद्या, भुवनेश्वरी, भैरवी, छिन्नमस्ता, धूमावती, बगला, मातंगी, कमला इन दश महाविद्याओं से सम्बद्ध अलग-अलग ग्रन्थ उपलब्ध हैं। 

महाविद्या काली से सम्बन्धित ग्रन्थों की संख्या काफी है। इनमें से कुछ मुख्य नाम इस प्रकार है - काली यामल, काली कल्प, कालीकुल क्रमार्चन, काली विलास तंत्र, काली कुल सर्वस्व, काली सपर्याक्रम, काली तंत्र, काली परा, कालीकुल, कालिकार्णव, भद्रकाली चिंतामणि, व्योमकेश संहिता, कल्पवल्ली, श्यामा रहस्य, विश्वसार तंत्र, कामेश्वरी तंत्र, कुल चूड़ामणि, कौलावलि, कुलमूलावतार, श्यामासपर्या, शक्ति संगम तंत्र, आदि महत्वपूर्ण हैं। अनेक ग्रन्थ ऐसे भी हैं जो विभिन्न देवताओं की उपासना से सम्बन्धित सामग्री से परिपूर्ण है। यह एक प्रकार से संकलन ग्रंथ हैं फिर भी महत्वपूर्ण हैं, जैसे मंत्र महार्णव, मंत्र-महोदधि, शाक्त प्रमोद, तंत्रसार, शारदा तिलक आदि। 

महाविद्या तारा से सम्बन्धित जो ग्रन्थ हैं उनमें मुख्य हैं- तारोपनिषद, तारार्णव, तारा तंत्र, तारा रहस्य, तारा कल्प, तारा सूक्त, तोडल तंत्र,  नील यंत्र, महानील तंत्र, नील सरस्वती तंत्र, चीनाचार, तन्त्र रत्न, तारा शाबर तंत्र,  एक-जटी तंत्र, एक जटा-कल्प, महाचीनाचार क्रम, एक-वीर तंत्र, तारिणी तंत्र आदि। तारा से सम्बद्ध संकलन ग्रन्थ भी हैं, उनमें मुख्य तारा भक्ति सुधार्णव है। 

महाविद्या श्री विद्या से सम्बन्धित जो ग्रन्थ उपलब्द्द होते हैं उनमें मुख्य हैं- त्रिपुरा रहस्य (माहात्म्य खण्ड एवं ज्ञान खण्ड), श्री विद्यार्णव तंत्र, श्री विद्या रत्नाकर एवं श्री विद्या वरिवस्या ( दोनों ग्रन्थ ब्रह्मलीन धर्म-सम्राट् यतिचक्र चूड़ामणि पूज्य चरण-रज स्वामी करपात्रि जी महाराज द्वारा रचित) स्वच्छन्द तंत्र, कालोत्तर वासना, श्री पराक्रम, ललितार्चन, चन्द्रिका, सौभाग्य तन्त्रोत्तर, सौभाग्य सुभगोदय, शक्ति संगम तंत्र का सुन्दरी खण्ड, श्री क्रमोतंग, सुभगपारिजात,  सुभगार्चारत्न, चन्द्र ज्ञान, सुन्दरी हृदय, नित्याषोडशिकार्णव, मातृका हृदय, संमोहन, वामकेश्वर, बहुरूपाष्टक, प्रस्तावचिन्तामणि और मेरू प्रस्तर। इसके अतिरिक्त संकलन ग्रन्थ, श्री योगिनी हृदय, परशुराम कल्प सूत्र वृत्ति, परमानन्द तंत्र, सौभाग्य कल्पलतिका, ज्ञानार्णव, श्री क्रम संहिता, दक्षिणामूर्ति संहिता, आज्ञावतार, संकेत पादुका, चन्द्रपीठ ललितोपाख्यान, लक्ष्मी तंत्र, कामकला विलास, सौभाग्य चन्द्रोदय, श्री विद्यारत्न सूत्र आदि अनेक ग्रन्थ हैं।

महाविद्या भुवनेश्वरी से सम्बन्धित भुवनेश्वरी रहस्य, भुवनेश्वरी तंत्र, भुवनेश्वरी पारिजात आदि मुख्य ग्रन्थ हैं।

महाविद्या भैरवी से सम्बन्धित भैरवी सपर्याविधि, भैरवी रहस्य, भैरवी तंत्र, मुण्डमाला तंत्रादि ग्रन्थ हैं। 

महाविद्या छिन्नमस्ता से सम्बन्धित शक्ति संगम के समावेश तंत्र का छिन्ना खण्ड है, किन्तु छिन्न मस्ता का पर्याप्त उल्लेख प्रकरण ग्रन्थों में मिलता है। 

महाविद्या द्दूमावती के लिये प्राणःतोषिणी तंत्र विशेष रूप से उल्लेख है इसके अतिरिक्त मंत्र महोदधि, मंत्र महार्णव आदि प्रकरण ग्रन्थों में इनका स्वरूप और साधना का विवेचन है। 

महाविद्या बगला से सम्बन्धित मुख्य ग्रन्थ है- सांख्यायन तंत्र। इसके अतिरिक्त बगला क्रम कल्पवल्ली नाम का एक और महत्वपूर्ण ग्रन्थ मिलता है। प्रकरण ग्रन्थों में बगलामुखी रहस्यम् की चर्चा है। 

महाविद्या मातंगी से सम्बद्ध ग्रन्थों में मातंगी क्रम, मातंगी पद्धति आदि ग्रन्थों का उल्लेख है। इसके अतिरिक्त प्रकरण ग्रन्थ इस विद्या का मुख्य आधार है। 

महाविद्या कमला से सम्बन्धित ग्रन्थों में तंत्रसार, शारदा तिलक, शाक्त प्रमोद आदि ग्रन्थ आते हैं।

तंत्र साहित्य अपने आपमें बहुत विशाल है तथा उसके अन्तर्गत विभिन्न सम्प्रदायों की साधना पद्धतियाँ आ जाती है। 

आगम शास्त्र के विकास का क्रमः- आगमतंत्र की प्राचीनता असंदिग्ध है, वेदों के समानान्तर प्राचीनता की दृष्टि से इसे माना जाता है। कुछ विद्धानों के मत से तो वेद से भी प्राचीन आगमतंत्र है। एक धारणा यह है कि तन्त्र वेद के समानान्तर विकसित हुआ और तांत्रिक पद्धतियों का अवतार रूप से प्रभाव वेदों में आया है। जनमानस में एक धारणा है कि भारत में सबसे प्राचीन वेद हैं तथा जितने भी धर्म एवं साधना पद्धतियां हैं वे सब वेद के बाद के हैं और वेद से प्रभावित हैं, किन्तु तंत्र का व्यापक क्षेत्र देखते हुए यह अनुमान है कि तंत्र किसी न किसी रूप में वेदों के पूर्व समाज में था तथा वेदों के समानान्तर भी था। तांत्रिक ग्रन्थ जो वर्तमान में उपलब्ध हैं, वेदों के बहुत बाद के है पर ग्रन्थों के निर्माण के साथ इसके उद्भव को जोड़ना किसी भी तरह सही नहीं होगा, कुछ ऐसी विचारधाराएँ और साधनात्मक क्रियाएँ होती हैं जो लिखित में तो बाद में आती हैं किन्तु व्यवहार में कई वर्ष पूर्व से चलती रहती हैं। वेद के लिये जो शब्द प्रचलित था और उसी अर्थ में जाना गया वह शब्द है ‘निगम’, और तंत्र के लिये जो शब्द प्रचलन में था वह शब्द है ‘आगम’। प्रायः निगम आगम शब्द एक साथ प्रयुक्त होते हैं। अतः दोनों को समानान्तर मानने में आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

तंत्र वस्तुतः एक साधना पद्धति है, आगम ग्रन्थों में जिन साधकों अथवा विभिन्न महाविद्याओं के उपासकों का नाम आता है वे प्रायः वैदिक ऋषि हैं। इसके साथ ही यह भी ध्यान देने योग्य है कि तंत्र का जो उद्देश्य और मूल स्रोत है वे दोनों वेदों में भी मिलते हैं। शक्ति तत्व उन्हीं में एक है इसीलिये तंत्र की शाक्त परम्परा अथवा अन्य परम्पराएँ किसी न किसी रूप में वेदों में हैं। यह स्वरूप, वैदिक संहिताओं के सबसे प्राचीन रूप ऋग्वेद, में भी उपलब्ध है और अथर्ववेद में यह स्वरूप स्पष्ट रूप से मिलता है। इसलिये तंत्र की प्राचीनता के सम्बन्ध में जो प्रश्न हैं, उनका समाधान वैदिक काल में अथवा प्राग्वैदिक काल में ही मिलता है। वेदों को आधार मान कर भारत में जिन दर्शनों का विकास हुआ, तांत्रिक दर्शन उसका मूल तत्व है। इसके अतिरिक्त उसकी अपनी स्वतन्त्र पहचान भी है। मंत्र साक्षात्कार के सम्बन्ध में यह कहा जाता है कि- ”ऋषयः मंत्र द्रष्टारः।“ 

वैदिक ऋचाओं और तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार करने वाले अनेक ऋषि हैं। वशिष्ठ मुनि तारा के उपासक थे। लोपामुद्रा, अगस्त्य, दुर्वासा आदि श्री विद्या के साधक थे। इसी प्रकार देवताओं का भी तांत्रिक मंत्रों के साक्षात्कार और उससे जुड़ाव का संदर्भ तंत्र ग्रन्थों में मिलता है। श्री विद्यार्णव तंत्र के अनुसार श्री विद्या के साधकों के नाम इस प्रकार हैं- ‘मनुश्चन्दः कुबेरश्च लोपामुद्रा च कामराट्ख्या, अगस्त्यनन्दि सूर्याश्च विष्णु स्कन्द शिवास्तथा।। दुर्वासाश्च महादेव्याः द्वादशोपासकाः स्मृता, शक्रश्चचोन्मना चैव तथा च वरूणस्ततः।। धर्मराजोऽनलो नागराजो वायुर्वुधस्तथा, ईशानश्च रतिश्चैव तथा नारायणोऽपि च।। ब्रह्मा जीवो महादेव्यास्त्रयोदश उपासकाः, पंचविशति संख्योपासकानां महेश्वरि।।

ऐतिहासिक काल में श्री गौड़पाद, गोविन्दपाद, और आदि गुरू शंकराचार्य का नाम विशेष उल्लेखनीय हैं। यह सभी आचार्य भारतीय दर्शन के क्षेत्र में और वैदिक व्याख्यान तथा तत्वज्ञान के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं। यह तीनों आचार्य श्री विद्या के उपासक थे। गौड़पादाचार्य की पुस्तक श्री विद्यारत्न सूत्र उपलब्ध है। शंकराचार्य की सौन्दर्य लहरी सुप्रसिद्ध है। शंकराचार्य की जो गुरू परम्परा का है उससे पता लगता है कि प्राचीन काल से यह विद्या उत्तरोत्तर क्रम से शिष्य परम्परा से उपस्थित है। अतः निष्कर्ष निकलता है कि तांत्रिक साधना और शक्ति उपासना निर्विरोध रूप से वैदिक परम्परा के मान्य आचार्यों में भी समान रूप से प्रचलित थी।

आगमशास्त्र की द्दार्मिक और साधनात्मक पृष्ठभूमिः- तंत्र की अवधारणा है कि तांत्रिक साधना का उपदेश देवाधिदेव शिव के द्वारा हुआ है। शिव के सम्बन्ध में एक विशेष बात है कि जितना वह देवताओं के लिये मान्य थे उतना ही वे दैत्यों के भी मान्य हैं। शिव आर्यों और अनार्यों दोनों के लिये समान रूप से मान्य हैं। धर्म वास्तव में मानवतावादी होता है, कभी भी सम्प्रदायवादी नहीं होता है। धर्म मनुष्य मात्र के लिये कल्याण की कामना रखता है। जब धर्म में संकीर्णता आने लगती है और यह किसी विशेष वर्ग में बंधने लगता है तब वह सम्प्रदायवाद का रूप लेता है। तंत्र की इस दृष्टि से यह विशेषता सर्वोपरि है कि इसने सभी के तापों को दूर करने का विचार किया। अतः तंत्र की व्यापक दृष्टि सर्वापरि है इसी कारण यह अन्य सभी धर्मो से विशिष्ट भी है। यह वर्ग, जाति, स्थान, लिंग, आदि का भेद नहीं करता।

उत्तर वैदिक काल में आर्यों का समाज चार वर्णों में विभक्त हो चुका था और स्मृतिकाल आते-आते स्त्रियों एवं शूद्रों को वेद पढ़ने तथा साद्दना से वंचित कर दिया गया। सामाजिक स्तर पर ऊँच-नीच तथा छुआछूत का भेदभाव बहुत बढ़ गया था। आर्य एवं अनार्य भेद हो चुका था। अतः मनुष्य जाति के लिये श्रेय के साधन और अवसर भी विषम हो गये थे। ऐसी परिस्थिति में आगम ही एक ऐसा साधन मार्ग था जो सभी को समान अवसर और समान प्रतिष्ठा देने वाला था। 

वैदिक काल में स्त्रियाँ भी मन्त्रों का साक्षात्कार करने वाली हुआ करती थीं और उच्चकोटि की साधिका होती थीं, पर बाद में उन्हें वेदाध्ययन और मंत्र साधना से वंचित कर दिया गया। शाक्त संप्रदाय ने स्त्रियों की पुनः प्रतिष्ठा की यहां तक कि उन्हें गुरूपद प्रदान किया। जिस नारी सम्प्रदाय को साधना विरोधी तत्वों द्वारा, ‘नारी नरकस्यं द्वारं’ की स्थिति  तक पहुँचा दिया था, उन्हें साधना/उपास्य के सर्वोच्च पद पर स्थापित किया गया, उन्हें पूज्य माना गया और कहा गया कि ‘पुष्पेणाऽपि न ताडयेत्’, अर्थात् स्त्री को पुष्प से भी ताड़न नहीं करना चाहिए। इसका अनुमान कुलार्णव तंत्र के वक्तव्य से लगाया जा सकता है कि जिसमें शिव के मुंह से यह वाक्य निसृत होता है कि चक्र में स्त्री हो अथवा पुरूष, क्लीव हो अथवा चाण्डाल, यहाँ तक कि उसमें द्विजोत्तम ही क्यों न हो फिर भी उन सभी में कोई भेद नहीं होता। यह भी कहा है कि चक्र में जाति भेद कहीं नहीं होता सभी शिव सदृश होते हैं जैसे वेद में स्थित सभी ब्रह्म कहलाते हैं उसी तरह चक्र में सभी पुरूष शिव के समान हैं और सभी स्त्रियाँ पार्वती के समान हैं। 

तंत्र ने धार्मिक दृष्टि से किसी का विरोध नहीं किया अपितु जो भी उपयोगी था उसे ग्रहण किया। जैसे वैदिक मंत्रों का भी उसमें समावेश पाया जाता है। तंत्र ने षट्चक्र, कुण्डलिनी योग, मंत्रयोग, अन्तर्योग आदि साधनाओं का उपयोग किया है। 

मनुष्य की प्रवृत्तियाँ भिन्न-भिन्न होती है तथा साधना क्रम में साधना की और साधक की अवस्थाओं में भिन्नता होती है। इस दृष्टि से दिव्य भाव की स्थिति में पहुँचने के पूर्व एक ही विधान से काम नहीं चल सकता, वैसा करने पर या तो सभी की प्रवृत्ति साधना में नहीं हो सकती, अथवा सम्यक् विकास में बाधा हो सकती है। इसीलिये तंत्र ने विभिन्न आचारों की व्यवस्था की है जबकि आचार प्रकृति तथा अवस्था के अनुसार एक व्यवस्था मात्र है। आचार बंधन नहीं है अपितु बंधन से मुक्ति का मार्ग है। आचार को तात्कालिक नियम भी कहा जा सकता है। तंत्र ने सात आचारों को स्वीकार किया है- वेदाचार, वैष्णवाचार, शैवाचार, दक्षिणाचार, वामाचार, सिद्धान्ताचार और कौलाचार। इन आचारों को उत्तरोत्तर क्रम से श्रेष्ठ माना गया है- ‘सर्वेभ्यश्चोत्तभा वेदा वैष्णवं परम्। वैष्णवादुत्तमं शैवं शैवाद् दक्षिणामुत्तमम्।। दक्षिणादुत्तमं वामं वामात् सिद्धान्तमुत्तमम्। सिद्धान्तादुत्तमं कौलं कौलात्परतरंनहि।।’

इसी प्रकार साधनाक्रम में तंत्र तीन प्रकार के भावों पर विचार करता है, वे भाव है : पशु भाव, वीर भाव, दिव्य भाव,। ये भाव साधना की अवस्था के परिचायक हैं, और इनमें उत्तरोत्तर क्रम विकास भी होता है। यह आवश्यक नहीं है कि एक ही भाव में जीवन भर रहा जाए, अपितु लक्ष्य तो यह है कि सभी साधक दिव्य भाव में पहुँचे। कोई पशु भाव से आरम्भ करके दिव्य भाव में पहुँच सकता है। 

तंत्र का दृष्टिकोण अपने मूल लक्ष्य की प्राप्ति में सदा सतर्क है और उसकी प्राप्ति के लिये जितने भी कोषों से सहायता की अपेक्षा है, तंत्र उन सभी बिन्दुओं पर गंभीरता से ध्यान रखता है। तंत्र का मूल लक्ष्य है- ज्ञानोपलब्द्दि, आत्मसाक्षात्कार और त्रय-तापों से मुक्ति। जीवन मुक्त होना भी उसका लक्ष्य है। आगम जगत् से पलायन नहीं अपितु जगत् को स्वीकार करता है। इसीलिये तंत्र भोग और मोक्ष में विरोध अनुभव नहीं करता। कहा गया है कि जहाँ भोग है वहाँ मोक्ष नहीं हो सकता और जहाँ मोक्ष है वहाँ भोग नहीं हो सकता, किन्तु शक्ति उपासकों के लिये भोग और मोक्ष दोनों विरोधरहित होकर करस्थ रहते हैं। तंत्र का यह प्रसिद्ध श्लोक प्रायः उधृत है- ‘यत्रास्ति भोगो न च मोक्षो यत्रास्ति मोक्षो न च तत्र भोगः। श्री सुन्दरी सेवन तत्पराणां भोगश्च मोक्षश्च करस्थ एव।।’

तंत्र वस्तुतः आत्म साक्षात्कार की साधना है इसीलिये तंत्र में अन्तर्यजन, कुण्डलिनी साधना और षट्चक्र पर पर्याप्त जोर डाला गया है। अन्तर्यजन के माध्यम से अन्तःकरण का परिष्कार होता है तथा साधक की तुरीयावस्था में पहुँचने की स्थिति बनती है। षट्चक्रों की साधना के माध्यम से ‘मन’ का, विशेषतः ‘अचेतन मन’ का विभिन्न स्थितियों मे अधिरोहण होता है। कुण्डलिनी का जागरण मूलतः आत्मा का अभ्युत्थान या आत्म साक्षात्कार  की दिशा में विकास की गति से जुड़ाव है। मंत्र को इस साक्षात्कार के क्रम में सबसे समर्थ साधन के रूप में स्वीकार किया गया है। मंत्र वर्णों या अक्षरों के योग से बनता है। भिन्न-भिन्न मंत्रों की संघटना भी भिन्न-भिन्न होती है। अक्षर कभी नहीं होता और वह सूक्ष्मता की स्थिति में निरन्तर व्यापक होकर तरंगित होता रहता है। इसी दृष्टि से शब्द को ब्रह्म माना गया है। शब्द की चार अवस्थाएँ होती हैं- वैखरी, मध्यमा, पश्यन्ति और परा। वैखरी प्रकट और स्थूल रूप है। मध्यमा से अन्तः प्रवेश होता है, तथा पश्यन्ती को पार कर परावस्था में पहुँचने पर साक्षात्कार, आत्मबोध या ब्रह्मबोध की स्थिति बनती है। इसी दृष्टि से मंत्र आगम साधना का सबसे समर्थ साधन है। 

तंत्र मूलतः आत्म साधना है। इसलिये तंत्र में जो बाह्यार्चन का विधान है वहाँ पर अपनी आत्मा को ही भावरूप में इष्ट देवता मानकर यंत्र पर स्थापित किया जाता है और उसका अर्चन किया जाता है। दशमहाविद्याओं की अथवा अन्य देवताओं की रूप कल्पना करके जो ध्यान, साधना और उसका अर्चन विधान है वह आत्मा का ही रूपान्तरित रूप है। इस प्रकार की परिकल्पना से अर्थात् किसी देवता को ब्रह्मरूप एवं इष्ट मान लेने से मनुष्य के मन में अहंकार के उदय की संभावना कम होती है तथा जीव जो सीमा से बद्ध है असीम के साथ जुड़ने के प्रशस्त पथ पर बढ़ने में सुविधा का अनुभव करता है। बाहर से जो रूप साधना प्रतीत होती है वह वस्तुतः अल्प बोध के लिये मार्ग है। मनुष्य को बाह्य रूप से जो बंधन दिखाई पड़ते हैं वे इतने कठोर होते हैं कि जीव, जीवन-पर्यन्त अथवा जन्मान्तरों तक अपने स्वरूप के बोध में असमर्थ रहता है। यद्यपि ये बंधन संस्कारगत होते हैं, किन्तु ये इतने गहरे होते है कि इनसे छुटकारा पाना आसान नहीं होता। इन बंधनों को आगमशास्त्र में पाश कहा गया है और कहा गया है कि जब तक मनुष्य इन बंधनों से युक्त है तक तक वह जीव कहलाता है और जब इनसे मुक्त हो जाता है तो वह जीवन्मुक्त अर्थात् सदाशिव हो जाता है। 

वेदों में शक्ति तत्वः- शक्ति तत्व की उपासना अनादिकाल से ही संसार में होती आ रही है। इससे लौकिक एवं पारमार्थिक दोनों विषयों की सिद्धि होती है। बल, ऐश्वर्य, ज्ञान, सौन्दर्य, निःश्रेयस आदि शक्ति तत्व के ही रूपान्तर हैं। ब्रह्म भी शक्ति तत्व का अभिन्न रूपान्तर ही है। आचार्य भगवत्पाद ने सौन्दर्य लहरी में कहा हैं --

शिवः शक्तया युक्तो यदि भवति शक्तः प्रभवितुं,

न चेदेवं देवो न खलु कुशलः स्पन्दितुमति।।

ब्रह्म शक्ति तत्व युक्त होकर ही कार्य करने में समर्थ है अन्यथा कुछ भी नहीं कर सकता है। प्रत्यक्ष रूप में भी देखा गया है कि शक्तिमान ही कार्य करता है। इतिहास से भी यह बात स्पष्ट है कि सदैव शक्तिशालियों का ही बोलबाला रहा है। 

वैदिक साहित्य में भी सबसे प्राचीन संहिता ग्रन्थों में अनेक मन्त्रों में शक्ति-तत्व का रहस्य कहा गया है। देवी सूक्त, रात्रि सूक्त, सरस्वती सूक्त आदि प्रसिद्ध हैं। अथर्ववेद के प्रथम काण्ड के तेरहवें सूक्त में चार मन्त्र हैं- सूक्त के भृगु अंगरिस ऋषि हैं। विद्युत देवता है। विद्युत्तत्व के द्रष्टा भृगु मुनि की शक्ति का उदाहरण पुराणों में जिस प्रकार दिया गया है वैसा अन्य किसी आर्य ग्रन्थ में नहीं मिलता है। भृगु मुनि इतने शक्तिशाली हैं कि उन्हांने ब्रह्मा, विष्णु और महेश की परीक्षा में विष्णु के लात मारी थी। यह महत्व शक्ति का ही है। भृगु अंगिरा मुनि ने ही इस अनादि शक्ति विज्ञान को जगत् के सामने प्रकट किया है। विद्युत इस सूक्त का प्रतिपाद्य देवता रूप शक्ति पदार्थ है। पाश्चात्य विज्ञान के मत से बिजली तत्व का जो प्रचार एवं उपयोग हो रहा है वह इसका स्थूल रूप ही है। 

विद्युत में गति है। जहाँ शब्द का होना नियम सिद्ध है। शब्द ही वज्र है अथवा उसकी अभिन्न शक्ति ही वज्र कहलाती है - ”वज्र एव वाक्“। महर्षि पतंजलि महाभाष्य में कहते हैं - ”सवाग्वज्रो यजमानं हनस्ति“ वह वाणी वज्र होकर यजमान का विनाश कर देती है। अस्तु बिजली शक्ति के भौतिक दैविक एवं आध्यात्मिक रूप होते हैं। इसीलिए मंत्रों को बहुत सोच समझ कर प्रयोग करने की बात प्रत्येक तंत्र ग्रन्थ में कही गई है।  

तांत्रिक ग्रन्थों में भगवान् शिव बताते हैं कि मूलाधार चक्र में सर्प की आकृति में साढ़े तीन फेरे में लिपटी इस जगत का अभिन्न निमित्तोपादन कारण शक्ति तत्व ही है। यह तत्व आन्तरिक साधन से जागृत होता है। त्रिपुरासार समुच्चय में कहा गया है -

शक्तिः कुण्डलिनीति यानिगविता आईम संज्ञा जगन्निर्माणे सततोद्यता प्रचिलसत् सौदामिनी सिन्नभां शंखावर्तनिभां प्रसुप्त भुजगाकारं जगन्मोहिनीम् तन्मध्ये परिभावयेद् विसलतातन्तुपमेया कृत्तिम।। हूं कारेण गुरूपदिष्टविधिना प्रात्थाप्य सुप्तां समाहितमनास्तामुच्चरेत् कौशिकीं शक्ति ब्रह्ममहापथेन सहितामाधारतः स्वात्मना।। 

अर्थात् आईम संज्ञावली जगत् रचना में सततोद्यत, चमकती हुई बिजली के सदृश, शंख के मुख के समान आवर्त (चक्करदार) सदृश, सोये हुए सर्प के समान, सारे जगत् को मुग्ध करने वाली, विस तन्तु के समान कुण्डलिनी शक्ति मानी गई है। गुरू द्वारा बताई गई रीति से हूँ बीज के अभ्यास से सोई हुई कुण्डलिनी को उठाकर परम चित्कला से उसका योग करके आधार पद्म से लेकर सहस्रार पर्यन्त समस्त षट्चक्रों का समाहित मन द्वारा अनुभव करना चाहिए।। 

‘सर्व खल्विदं ब्रह्म’ के अनुसार शक्ति का स्थूल रूप इस पराशक्ति का रूपान्तर है। जो गुण की विचित्रता से नाना प्रकार प्रतीत हो रहा है। ‘एकं सद् विप्रा बहुधा वदन्ति’ का यही अभिप्राय है। 

द्वैत अवस्था में रहते हुए योग क्षेम की प्राप्ति करना भी अत्यंत आवश्यक है अतः सूक्त के दूसरे मन्त्र द्वारा ऋषि कहते हैं -- नमस्ते प्रवतो न पाद्यस्तपः समुहसि। 

मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि।।

हे देवि, प्रकृष्ट ज्ञानवालों को तू पतन की ओर नहीं ले जाती है इसलिये तुझे नमस्कार है क्योंकि तू तप, ज्ञान आदि श्रेष्ठ वस्तुओं का समूह  है। अपने कल्याणात्मक रूपों से हमारी रक्षा कर। हम तेरी सन्तान हैं। हमारे लिये कल्याण का दर्शन करो।

भुक्ति-मुक्ति दोनों प्रकारों की प्राप्ति शक्ति साधना से होती है। इसी अभिप्राय से सप्तशती ग्रन्थ में सुरथ तथा समाधि इन दोनों अधिकारियों कों मेधा महर्षि ने उपदेश दिया है। ‘भोगश्च मोक्षश्यच करस्थ एव’ - वाला सिद्धान्त इसी तत्व पर माना गया है। 

”अन्धन्तमः प्रविशन्ति ये अविद्यामुपासते“ में भी उक्त तत्व को कहा गया है - अविद्या की उपासना करने वाले अंधकार में चले जाते हैं यही पतन है। ‘विद्ययामृतमश्नुते’ विद्या से ही अमृत की प्राप्ति होती है। अस्तु तू विद्वानों को पतन की ओर नहीं ले जाती हैैै। अतः हमें भी वही मार्ग बता। 

अहं मम रूप अविद्या जन्म संसार में ही लगे रहने वाले जीव बार-बार जन्म मरण रूप संसार में आते रहते हैं क्योंकि उनके सुख का आद्दार क्षणिक, विनाशी, आपात् रमणीय यह संसार ही है। उन्हें शान्ति नहीं मिलती। अतः मुमुक्षु इससे विरक्त होकर विद्या का अनुसरण करता है। गीता में कहा है- ‘यद् गत्वान निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम।’ इसी को कठोपनिषद् में- ‘सोऽध्वनः पारमाप्नोति यस्माद् भूयो न जायते।’ इस प्रकार कहा गया है, अर्थात् ब्रह्म को प्राप्त होने पर फिर संसार में मुमुक्षु नहीं आता। इसी तत्व को ”प्रवतो न यात्“ इस पद से कहा गया है। यही शक्ति का परमधाम है। सप्तशती में कहा गया है -‘मोक्षार्थिभिर्मुनिभिरस्त समस्त दोषैविद्यासि सा भगवती परमाहि देवि।’ अर्थात् समस्त अविद्या दोषों से रहित होकर मोक्षार्थी मुनिगण विद्या रूप से तुम्हारा ही अभ्यास करते हैं। वह विद्या तुम हो। जब-जब भक्त समुदाय असुरों से पीड़ित होता है, तब-तब असुरों के विनाशार्थ श्री आदिशक्ति का आविर्भाव होता है जिसे किसी न किसी प्रकार से समस्त आस्तिक समुदाय मानता है। 

दुर्गा सप्तशती में श्री भगवती के अस्त्रों से रक्षा की प्रार्थना की गई है। ‘खड्ग शूल गदादीनि यानि चास्त्राणि तेऽम्बिके। कर पल्लव संगीन तैरस्मान् रक्ष सर्वतः।।’ अर्थात् हे अम्बिके, खड्ग शूल गदा आदि जितने तुम्हारे अस्त्र शस्त्र हैं, उनसे आप सब ओर से हमारी रक्षा करें। हे देवि, समुद्र परमात्मा में अभेद सम्बन्ध सामरस्य भावापन्न होकर तू छिपी हुई है उसे हम उपनिषद द्वारा जानते हैं।

‘मम योतिरप्सु अन्तः समुद्रे’- इस मंत्र में भी समुद्र पद आधारार्थों में व्यवहृत हुआ है। सायणाचार्य ने इसका अर्थ परमात्मा ही किया है- समुद्रवन्त्यस्माद्भूतानि इति समुद्रः परमात्मा अर्थात् सब प्राणी समूह जिससे प्रकट होते हैं इसलिये परमात्मा को समुद्र कहते हैं। बहुत लोग इस मंत्रांश से ब्रह्म को कारण तथा शक्ति तत्व को कार्य समझते हैं परन्तु यह उनका भ्रम है। गीता में ब्रह्म का योनि कारण शक्ति को ही माना गया है। ‘ममयोनिर्महद् ब्रह्म तस्मिनगर्भ दधाम्यहम्।’ वास्तव में निमित्त की अपेक्षा से ब्रह्म, शक्ति दोनों के परम कारणत्व का व्यवहार होता है। 

‘प्राणो वा अपानो व्यानेस्तस्रों देव्यः’ अर्थात् प्राण अपान और व्यान तीनों को देवी बताया गया है। वास्तव में प्राण ही शक्ति है। इसी को लोक में आत्मबल कहते हैं। इसी प्राण, अपान और व्यान को पौराणिक सिद्धान्त में महाकाली, महालक्ष्मी, महासरस्वती, कहते हैं। महाविद्याक्रम में यही काली तारा षोडशी कहलाती है। 

‘ता वा एता देव्यः दिशो ह्येता’ अर्थात् ये दशां दिशाएँ ही दश देवियाँ है। महा भागवत में ऐसी कथा आई है कि, जब सती अपने पिता दक्ष के घर जाने लगी तब उन्हें श्री शंकर ने रोका। तब अपने भयानक रूप को प्रकट किया श्री महादेव उसे न देख सकने के कारण भागे, तब भगवती ने अपने दश महाविद्या रूप दशों दिशाओं में धारण कर श्री शंकर को रोका था। 

दुर्गा सप्तशती मध्यम चरित्र की कथा को मार्कण्डेय पुराण में विस्तार से कहा गया है- सप्तशती के दूसरे अध्याय में यह कथा आई है कि महिषासुर दैत्य ने एक समय अपने आतंक से देवताओं को पीड़ित किया था। देवताओं ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश के साथ मिलकर एक महान तेज प्रकट किया। वह तेज दिव्य स्त्री के रूप में प्रकट हुआ। अपने-अपने अस्त्र शस्त्र को उसे सब देवताओं ने प्रदान किया। सभी के अंग के रूप में वह महाशक्ति बनी थी, जिसे कहा गया है- ”निःशेष देवगण शक्ति समूह मूर्त्या“ अर्थात् समस्त देवताओं के शक्ति समूह से ही वह मूर्ति बनी थी। इसे ही सूक्त में ”यां तवां असृजन्त विदथे गुणानां“ इन रहस्यमय पदों से कहा गया हैं। उस महाशक्ति ने महिषासुर को युद्ध में मारा जिसे  ब्रह्मा, विष्णु आदि देवता भी नहीं मार सके थे। 

असुरों पर विजय प्राप्त करने पर देवताओं के अभिमान को निवृत्त करने के लिए साक्षात् कृपामयी हेमवती उमा का आविर्भाव केनोपनिषद ने बड़े ही सुन्दर रूप से लिखा है। ब्रह्मविद्या ही अभिमान अहंकार आदि रहित, शाश्वत शान्ति को देने वाली है, उसके बिना लौकिक विजय पुनः पतन का हेतु हो सकती है। अतः उपनिषद का उपसंहार- ”ज्येये स्वर्गे प्रतिष्ठित“ रूप में किया गया है। दुर्गा सप्तशती के चौथे अध्याय में उसी महत्वपूर्ण महती देवता की स्तुति भी देवताओं ने की है। ‘संगच्छध्वं संवदध्वं संवोमनांसि जानताम्’ वाले वैदिक एकता के रहस्य को प्रकट करने के लिये मध्यम चरित्र की कथा लिखी गई है। सप्प्तशती शक्ति तत्व के समस्त रहस्यों को प्रकट करने वाला ग्रन्थ रत्न है। ‘संघे शक्तिः’ वाली युक्ति शक्तिवाद की सर्वश्रेष्ठ उक्ति है। ऐसा कहा जाता है कि प्रथम उत्तर चरित्रों का पाठ अकेले करना मना है, किन्तु मध्यम चरित्र का पाठ अकेले भी कर सकते हैं। ‘एकेन वा मध्यमेन नैकेनेतरयोरिह’ अर्थात् एक मध्यम चरित्र के पाठ से ही पूर्णता हो जाती है। एकता के विषय में वेद का कथन है- ‘तंत्र को मोहः कः शोक एकत्वमनुपश्यतः’ अर्थात् एकता देखने वाले ज्ञानी समाज को शोक क्या? और मोह क्या? युद्ध या विप्लव के समय ही एकता का परम उपयोग होता है, क्यांकि युद्ध एक महान आपत्ति है। स्वार्थपरायणता के समय ही युद्ध होता है। व्यक्तिगत स्वार्थ से ही किसी देश, संस्कृति और जाति का पतन होता है। ऐसे समय में महालक्ष्मी सुमति प्रदान कर अपने राष्ट्र भक्तों की रक्षा करती है अतः उसकी स्तुति पूजा होती रहना चाहिए। महाभारत युद्ध में प्रवृत्त अर्जुन को श्री कृष्ण ने गीतोपदेश के प्रथम श्री दुर्गा भगवती की स्तुति करने को कहा था जिसे भीष्मपर्व में बड़े ही सुन्दर ढंग से बताया गया है। ‘मन एवास्तु तुभ्यम्’ अर्थात् तुम एक ही को हमारा नमस्कार है। सूक्त में सात बार नमः शब्द का प्रयोग होने से संसार की संचालिका सप्त मातृका रूप को, तथा निवृत्ति की सप्तभूमिका को नमस्कार किया गया है, ‘तस्यै ते नमोस्तु देवि’, इस स्त्रीलिंग वाचक ‘तस्मै’ देवि पदों से यह सूक्त शक्तिवाद का पोषक है, यह सिद्ध हो जाता है। 

अन्य साधना-पद्धतियों पर आगमशास्त्र का प्रभावः-

आगमशास्त्र अपनी वैज्ञानिकता/विशिष्टता के कारण भारत की अन्य साधना पद्धतियों को प्रभावित करता रहा है। यह प्रभाव बहुत गहराई है। प्रायः सभी पद्धतियों को तंत्र के प्रभावित करने अथवा अन्य पद्धतियों को तंत्र के प्रभाव को ग्रहण करने में मुख्य कारण यह है कि तंत्र की पद्धति वैज्ञानिक है तथा सर्वांगीण है। तंत्र ने साधना के क्षेत्र में कुछ ऐसे अन्वेषण किये है जो तंत्र के पूर्व नहीं थे और आत्म साक्षात्कार के कुछ ऐसे भी सूत्र हैं जो कई दृष्टियों से विभिन्न अवस्थाओं में साधक के लिये अधिक सुविधाजनक और उपयोगी हो सकते हैं। वैदिक काल में साधना का रूप यज्ञ था और वैदिक ऋचाओं का पाठ करना था। मंत्र जप का और मंत्र के पुरश्चरण का विधान नहीं था किन्तु तंत्र ने ही मंत्रों के जप को वाचिक, उपांशु और मानसिक में परिणित किया है। 

प्राचीन काल से लेकर मध्यकाल तक विभिन्न साधना पद्धतियों में तंत्र से प्रभाव ग्रहण करने की यह प्रक्रिया चलती रही है। वैष्णव पद्धति तो तंत्र के अंतर्गत ही आती है किन्तु जहाँ से वैष्णव में विरोध प्रतीत होता है वहाँ भी उनकी प्रक्रिया में तांत्रिक पद्धति का बहुत दूर तक समावेश है और जो विरोध दिखाई पड़ता है वह मंत्र के आधार से सम्बन्ध रखता है उसकी समग्रता से नही। 

बौद्धधर्म में तो तंत्र को प्रत्यक्षतः पूरी तरह स्वीकार कर लिया गया और इस दृष्टि से उसकी एक शाखा ‘वज्रयान’ अत्यन्त महत्वपूर्ण है। बौद्धों ने तंत्र को अपनी तरह से विकसित करने में योगदान किया है। उन्हांने ‘चीनाचार’ के माध्यम से भी बहुत कुछ ग्रहण किया है। तारा महाविद्या उनकी मुख्य साधना रही है। जैन धर्म में भी तंत्र का प्रभाव समुचित रूप से देखा जाता है। 

इस प्रकार हम देखते हैं कि भारत की सभी साधना पद्धतियाँ तंत्र से प्रभावित हैं। यह अलग बात है कि किस पद्धति को कितनी सफलता मिली। कुछ पद्धतियों ने केवल तंत्र में योग के हिस्से को लेकर अपने को विकसित किया है और कुछ ने इसके साथ कुछ अन्य अंगों को भी लेकर विकसित किया है। मध्यकाल में गोरखनाथ का सम्प्रदाय जो कि योग के लिए विख्यात है, उस सम्प्रदाय ने तंत्र को ग्रहण करके अपनी पद्धति को अलग तरह से विकसित किया। यदि सारी पद्धतियों में तंत्र प्रभाव ग्रहण की खोज और विश्लेषण किया जाय तो यह शोध हेतु एक पूर्ण विषय होगा। अब इस लेख को यहीं समाप्त करता हूं। 

विशेष जानकारी हेतु मेरे द्वारा लिखे शीघ्र प्रकाशित होने जा रहे महाग्रन्थ ‘श्री विद्या रहस्य’, एवं ‘यंत्र मंत्र तंत्र महासागर’ का अध्ययन करें।   

Thursday, June 25, 2020

श्री शुभ सम्वत् 2076-77 ईसवीय सन् 2020 के व्रत-उपवास-त्यौहार

            जनवरी-2020        
01.बुध-सतगुरू श्री गोविन्द सिंह महाराज का प्रकाशोत्सव प्रारम्भ। ईसाई नव वर्ष दिवस। ईसवीय सन् 2020 प्रारम्भ।
02.गुरू-सतगुरू श्री गोविन्द सिंह जयन्ती। बुध पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 28/19 पर।
03.शुक्र-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। श्री अन्नपूर्णाष्टमी व्रत। शाकम्भरी यात्रा। शाकम्भरी देवी नवरात्रारम्भ। शुक्र धनिष्ठा नक्षत्र में 17/23 पर।  
04.शनि-गुरू पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 16/18 पर।        
05.रवि-शाम्ब दशमी (उड़ीसा)। सूर्य पूजा (उड़ीसा)। रवि दशमी पर्व।
06.सोम-पुत्रदा एकादशी व्रत सबका। श्री हरि जयन्ती। मन्वादि।
08.बुध-प्रदोष व्रत। शुक्र कुम्भ राशि में 28/23 पर। 
09.गुरू-गुरू उदय पूर्व में 28/22 पर। 
10.शुक्र-स्नान-दान-व्रतादि की पौषी पूर्णिमा। पुष्याभिषेक यात्रा। शाकम्भरी। शाकम्भरी जयन्ती। शाकम्भरी देवी नवरात्र समाप्त। शाकम्भरी यात्रा समाप्त। पौष-मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त।
माघ मास कृष्ण पक्ष 
11.शनि-माघ कृष्ण पक्षारम्भ। माघ-मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। माघ मास भर प्रयाग में त्रिवेणी या काशी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान करना चाहिए। तिलपात्र दान। सूर्य उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में 19/35 पर। बुध उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में 10/59 पर।
12.रवि-श्री स्वामी विवेकानन्द जयन्ती
13.सोम-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 20/19 पर। सौभाग्य सुन्दरी व्रत। संकट हर गणपति व्रत। गौरी चतुर्थी व्रत। श्री गणेश जी की उत्पत्ति। तिलकुटी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। लोहड़ी। बुध मकर राशि में 11/34 पर।
14.मंगल-सूर्य की मकर संक्रान्ति 26/08 पर। चन्द्र-दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का पुण्यकाल अगले दिन।      निरयण सूर्य उत्तरायण और संकल्पादि में प्रयोजनीय शिशिर ऋतु प्रारम्भ। धनु (खर) मास समाप्त। शुक्र शतभिषा नक्षत्र में 15/57 पर।
15.बुध-संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय से 08/32 तक। (खिचड़ी पर्व)। काष्ठ-अन्न-तिल दान। काशी के दशाश्वमेध घाट व प्रयाग में स्नान। गंगासागर यात्रा। तिल संक्रान्ति (खिचड़ी)। पोंगल। केतु (वक्री) मूल नक्षत्र में 21/34 पर।    
16.गुरू-संक्रान्ति करिदिन।
17.शुक्र-अष्टका श्राद्ध, पार्वण की तरह विधि। अन्वष्टका। श्री स्वामी विवेकानन्द जयन्ती (तिथि अनुसार)। श्री रामानन्दाचार्य जयन्ती। कालाष्टमी। 08 तिथि क्षय।
19.रवि-रवि दशमी पर्व। मंगल ज्येष्ठा नक्षत्र में 14/32 पर। बुध श्रवण नक्षत्र में 10/41 पर।
20.सोम-षटतिला एकादशी व्रत सबका। सूर्य सायन कुम्भ राशि में 20/18 पर। 
21.मंगल-तिल द्वादशी। राष्ट्रीय माघ मासारम्भ। सूर्य की अभिजित प्रवृत्ति 14/44 पर। 
22.बुध-प्रदोष व्रत। मेरू त्रयोदशी व्रत (जैन)। आदिनाथ निर्वाण दिवस (जैन)।
23.गुरू-रटन्ती कालिका पूजन। मास शिवरात्रि व्रत। नेता जी सुभाष चन्द्र बोस जयन्ती।    
24.शुक्र-स्नान-दान-श्राद्धादि की अमावस्या। मौनी अमावस्या। प्रयाग या काशी के दशाश्वमेध घाट पर स्नान। महोदय पर्व। अन्वाधान। त्रिवेणी अमावस्या (उड़ीसा)। द्वापर युगादि। सूर्य श्रवण नक्षत्र में 21/51 पर।
माघ मास शुक्ल पक्ष
25.शनि-माघ मास शुक्ल पक्षारम्भ। गुप्त नवरात्रि प्रारम्भ। श्री बल्लभावतार। बल्लभ जयन्ती। माघ के सम्पूर्ण स्नान में असमर्थ व्यक्तियों को आज से तीन दिन तक गंगा में स्नान करना चाहिये। सूर्य की अभिजित निवृत्ति 18/20 पर। शुक्र पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में 17/08 पर।
26.रवि-चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। भारतीय गणतन्त्र दिवस। बुध धनिष्ठा नक्षत्र में 29/04 पर।
27.सोम-गौरी तृतीया। हिजरी जमादि उस्सानी 6 माह शुरू। बुध उदय पश्चिम में 20/14 पर।  
28.मंगल-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। भौम-अंगारकी पर्व। वरद 04। तिल 04। कुन्द 04। कुन्द पुष्प से देव पूजा। सोपपदा। वेदारम्भ में अनध्याय। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। 03 तिथि वृद्धि। लाला लाजपत राय जयन्ती। 
30.गुरू-बसंत पंचमी। श्री पंचमी। वागीश्वरी जयन्ती। सरस्वती पूजा। तक्षक पूजा। रतिकाम महोत्सव। महात्मा गाँधी (बापू निर्वाण दिवस)। सर्वोदय पखवारा शुरू। बुध कुम्भ राशि में 26/54 पर।  
31.शुक्र-मन्दार षष्ठी। श्री शीतलाषष्ठी (बंगाल)।
फरवरी-2020
01.शनि-अचला सप्तमी व्रत। रथ 07। पुत्र 07। मन्वादि 07। विधान 07। आरोग्य 7। अरूणोदय में गंगा स्नान। श्री माधवाचार्य जयन्ती। चन्द्रभागा 7 (उड़ीसा)। नर्मदा जयन्ती।
02.रवि-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। भीष्माष्टमी। भीष्मोद्देश्य से तर्पण। शुक्र मीन राशि में 26/18 पर। शनि उदय पूर्व में 14/13 पर।   
03.सोम-महानन्दा नवमी। श्री हरसू ब्रह्मदेव पुण्य तिथि (चैनपुर) रोहतास (कैमूर-बिहार)। बुध शतभिषा नक्षत्र में 29/26 पर।        
05.बुध-जया एकादशी व्रत सबका। भैमी 11 बंगाल। भक्त पुण्डरीक उत्सव (पंढरपुर)। शुक्र उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में 21 /55 पर।
06.गुरू-भीष्म द्वादशी। भीष्मोद्देश्य से तर्पण। तिल द्वादशी। तिलोत्पत्ति। सोपपदा 12। वेदारम्भ में अनध्याय। सूर्य धनिष्ठा नक्षत्र में 24/57 पर।
07.शुक्र-प्रदोष व्रत। कल्पादि 13। मरूस्थल मेला 3 दिन (जैसलमेर) राजस्थान। मंगल मूल नक्षत्र व धनु राशि में 27/51 पर।       
09.रवि-स्नान-दान-व्रतादि की माघी पूर्णिमा। भक्त रविदास जयन्ती। भैरवी जयन्ती। तिल दान। तिल पात्र दान। माघी मासम् (दक्षिण भारत)। ललिता जयन्ती। भैरव जयन्ती। अन्वाधान। माघ मासीय स्नान-दान-व्रत-यम नियमादि समाप्त।
फाल्गुन मास कृष्ण पक्ष
10.सोम-फाल्गुन मास कृष्ण पक्षारम्भ। माघ मासीय व्रत का पारण। फाल्गुन-मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। 02 तिथि क्षय। 
12.बुध-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/17 पर। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक।
13.गुरू-श्री सीताराम दास आेंकारनाथ महाराज का जन्मोत्सव (बंगाल)। आेंकार पंचमी। सूर्य की कुम्भ संक्रान्ति 15 /03 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल 08/39 से संक्रान्ति काल तक, तत्पश्चात् सामान्य पुण्यकाल संक्रान्ति काल से सूर्यास्त तक। गो, अन्न-दान, गोदावरी में स्नान।
15.शनि-कालाष्टमी।
16.रवि- श्री सीताष्टमी। जानकी जयन्ती। अष्टका श्राद्ध। अन्य अष्टका में असमर्थ व्यक्तियों को करना चाहिये। अन्वष्टका। बुध वक्री 30/21 पर।
17.सोम-समर्थ गुरू श्री रामदास जयन्ती। श्री रामदास नवमी। शुक्र रेवती नक्षत्र में 08/03 पर।
18.मंगल-स्वामी दयानन्द जयन्ती।
19.बुध-विजया एकादशी व्रत सबका। सूर्य शतभिषा नक्षत्र में 29/30 पर। सूर्य सायन मीन राशि में 10/19 पर।
20.गुरू-प्रदोष व्रत। राष्ट्रीय फाल्गुन मासारम्भ। बुध अस्त पश्चिम में 17/49 पर।  
21.शुक्र-महाशिवरात्रि व्रत (महानिशीथ काल 23/45 से 24/36 तक )। चतुर्दश ज्योतिर्लिंग पूजा। वैद्यनाथ जयन्ती। ऋषि बोधोत्सव। आर्य समाज सप्ताह प्रारम्भ। कृतिवासेश्वर दर्शन पूजन। श्री ताम्बेश्वर मंदिर सिद्ध पीठ ट्रस्ट (फतेहपुर) में महारूद्राभिषेक। 
23.रवि-स्नान-दान-श्राद्धादि की अमावस्या। अन्वाधान।
फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष
24.सोम-फाल्गुन मास शुक्ल पक्षारम्भ।
25.मंगल-परमहंस स्वामी रामकृष्ण जयन्ती। फुलरिया दूज। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ।
26.बुध-पं. लेखराम वीर तृतीया जयन्ती। हिजरी रज्जब 7 माह शुरू। अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती सज्जरी अलह के मजार पर उर्स का मेला शुरु।   
27.गुरू-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। मंगल पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 13 /10 पर।
28.शुक्र-ब्रह्मर्षि याज्ञवल्क्य जयन्ती। शुक्र अश्विनी नक्षत्र व मेष राशि में 25/32 पर। 04 तिथि वृद्धि।
29.शनि-आर्य समाज सप्ताह समाप्त।
मार्च-2020
01.रवि-गो रूपिणी षष्ठी (बंगाल)। आचार्य सुन्दर साहिब पुण्य तिथि (सच्चिदानन्द सम्प्रदाय)। 
03.मंगल-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। श्री अन्नपूर्णाष्टमी व्रत। होलाष्टकारम्भ। अष्टान्हिका प्रारम्भ (जैन)। बुध (वक्री) धनिष्ठा नक्षत्र में 13/22 पर। बुध उदय पूर्व में 28/37 पर। 
04.बुध-श्री दुर्गाष्टमी व्रत का पारण। सूर्य पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में 11/42 पर।              
05.गुरू-फागु दशमी (उड़ीसा)। श्री हरि जयन्ती।
06.शुक्र-आमलकी एकादशी व्रत सबका। रंगभरी एकादशी। श्री काशी विश्वनाथ श्रृंगार दिवस। बिड़कुला ढाल थापड़ा (भद्रा के बाद)।
07.शनि-गोविन्द द्वादशी। शनि प्रदोष व्रत (पुत्रार्थियों को यह व्रत करना चाहिए)। श्याम बाबा खाटू वाले का मेला (राजस्थान)। गुरू उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में 30/07 पर।  
08.रवि-14 तिथि क्षय।
09.सोम-स्नान दान-व्रतादि की पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्रयुता परमपुण्यदायिनी फाल्गुनी पूर्णिमा (परमपुण्य काल सूर्योदय से सूर्यास्त तक)। होलिका दहन (भद्रा के पश्चात्)। जेलपोणी (भद्रा के बाद)। मन्वादि। करि दिन। डोल यात्रा। हुताशनी पूर्णिमा। माघी मासम् (दक्षिण भारत)।  महाप्रभु चैतन्य जयन्ती। फाल्गुन-मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त। जन्मदिन हजरत अली।
चैत्र कृष्ण पक्ष
10.मंगल-चैत्र मास कृष्ण पक्षारम्भ। चैत्र-मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। काशी में होली। धुरड्डी। छारेंडी। वसन्तोत्सव। होलिका विभूति धारण। धूलि वंदन। श्वपच स्पर्श। साभ्यंग स्नान। आम्र कुसुम प्राशन। बसन्त नवसस्येष्टि। बसन्तोत्सव। करिदिन (देशाचार से)। बसन्त प्रतिपदा। बसंत स्नान। रतिकाम महोत्सव। होलाष्टक समाप्त। मेला आनन्दपुर साहब। बुध मार्गी 09/16 पर।
11.बुध-भ्रातृ द्वितीया। भैया दूज। भगिनी गृह में भोजन। संत तुकाराम जयन्ती।
12.गुरू-कल्पादि। संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/09 पर। छत्रपति शिवा जी जयन्ती (तिथि के अनुसार)।  ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। शुक्र भरणी नक्षत्र में 06/18 पर।    
14.शनि-रंग पंचमी। श्री जयन्ती। श्री पंचमी। शीतला षष्ठी। स्कन्द षष्ठी (बंगाल)। श्री एकनाथ षष्ठी। विजय गोविन्द हलंकर दिवस (मणिपुर)। नव चण्डी मेला प्रारम्भ (मेरठ)। 06 तिथि क्षय। सूर्य की मीन संक्रान्ति 11/53 बजे। चन्द्र दर्शन मु.45 समर्घ। संक्रान्ति का सामान्य पुण्यकाल सूर्योदय से संक्रान्ति काल तक, तत्पश्चात् विशेष पुण्यकाल संक्रान्ति काल से सूर्यास्त तक। गौ-अन्न दान, गोदावरी में स्नान। संकल्पादि में प्रयोजनीय बसन्त ऋतु प्रारम्भ। मीन (खर) मासारम्भ।
15.रवि-शीतला सप्तमी व्रत। भानु सप्तमी पर्व।
16.सोम-श्री शीतलाष्टमी व्रत (आज के दिन बासी भोजन विहित है)।
17.मंगल-सूर्य उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में 20/14 पर। मंगल उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में 19/28 पर। बुध शतभिषा नक्षत्र में 21/10 पर।
19.गुरू-पापमोचिनी एकादशी व्रत सबका।
20.शुक्र-सूर्य सायन मेष राशि में 09/09 पर। बसन्त सम्पात। सायन बसन्त ऋतु प्रारम्भ। सूर्य का उत्तर गोल प्रवेश। देवताओं का मध्यान्ह, दैत्यों की मध्य रात्रि, उत्तराक्रान्ति, महाविषुव दिन।
21.शनि-शनि प्रदोष व्रत। वारूणी योग 19/40 से। गँगा वरूणा संगम पर स्नान। आदि केशव भगवान का दर्शन पूजन। दमनोत्सव। मधुश्रवा त्रयोदशी। मेला पृथूदक पिहोवा तीर्थ (हरियाणा)। 12 तिथि वृद्धि। राष्ट्रीय चैत्र मासारम्भ। 
22.रवि-मास शिवरात्रि व्रत। वारूणी योग 10/09 तक। मंगल मकर राशि में 14/39 पर।    
23.सोम-शबे मिराज।
24.मंगल-स्नान दान श्राद्धादि की अमावस्या।  आज के दिन गँगा स्नान से सहस्त्र गायों के दान का फल प्राप्त होता है। चान्द्र सम्वत्सर 2076 (परिधारी) विक्रमीय समाप्त। अन्वाधान। शुक्र कृत्तिका नक्षत्र में 29/28 पर।           
चैत्र शुक्ल पक्ष
25.बुध-चैत्र मास शुक्ल पक्षारम्भ। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। विक्रम सम्वत् 2077 (प्रमादी) प्रारम्भ। चैत्र वासन्तिक नवरात्रारम्भ। कलश स्थापन। ध्वजारोहण। वर्षपति पूजा। कल्पादि 1। आरोग्य व्रत 1। विद्या व्रत 1। नवसम्वत्सरोत्सव। गुड़ी पड़वा। गुरू अमरदास गुरयाई दिवस। आर्य समाज स्थापना दिवस।
26.गुरू-श्रृंगार (सिंधारा) देशाचार से। सिन्धी सम्प्रदाय का श्री झूलेलाल जयन्ती महोत्सव। हिजरी सावान 8 माह शुरू।
27.शुक्र-मत्स्य जयन्ती। गणगौर। गणगौरी व्रत। सौभाग्य शयन तृतीया। आन्दोलन 3। सायं दोलारुढ़ शिव गौरी पूजन। सरहुल (बिहार)। मनोरथ तृतीया व्रत। अरून्धती व्रत-पूजन। मन्वादि 3।
28.शनि-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। गुरू अंगददेव जोति जोत। शुक्र वृष राशि में 15/39 पर।  
29.रवि-श्री रामराज्य महोत्सव मध्यान्ह-व्यापिनी पंचमी कर्क लग्न में। श्री पंचमी। कल्पादि 5। डोलोत्सव। श्री गुरु हरगोविन्द सिंह जोति जोत।
30.सोम-श्री सूर्य षष्ठी व्रत। स्कन्द षष्ठी व्रत (गया में प्रसिद्ध)। श्री अशोक षष्ठी व्रत (बंगाल)।
31.मंगल-वासन्ती दुर्गा पूजारम्भ। आयंबील (ओली) प्रारम्भ जैन। श्री अन्नपूर्णा परिक्रमा प्रारम्भ 27/50 बजे से। अशोक कलिका प्राशन। सूर्य रेवती नक्षत्र में 06/29 पर। बुध पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में 08/17 पर।
अप्रैल-2020
01.बुध-महानिशा पूजा। श्री दुर्गाष्टमी। भवानी उत्पत्ति। अष्टमी का हवनादि आज ही करें। श्री महाष्टमी व्रत। श्री अशोकाष्टमी। श्री बुधाष्टमी। प्राशस्त्य योग 19/29 से 27/41 तक। श्री अन्नपूर्णा परिक्रमा समाप्त 27/41 बजे। श्री अष्टभुजी दुर्गा शक्ति पीठ (दुर्गा मंदिर) ‘वाई’ ब्लाक, किदवई नगर कानपुर में शतचण्डी यज्ञ का हवन पूर्णाहुति एवं महाप्रसाद वितरण। शक्ति संगीत सभा।    
02.गुरू-श्री रामनवमी व्रत सबका। श्री दुर्गानवमी। तारा जयन्ती। श्री स्वामी नारायण जयन्ती। श्री राम-जन्म महोत्सव (मध्यान्ह कर्क लग्न में) रामावतार। अयोध्या परिक्रमा, दर्शन पूजन। नवमी का हवनादि आज ही करें। चैत्र नवरात्र समाप्त।       
03.शुक्र-श्री धर्मराज दशमी। नवरात्र व्रत का पारण। 
04.शनि-कामदा एकादशी व्रत सबका। श्री विष्णु दोलोत्सव। सायं दोलारुढ़ पूजन।
05.रवि-मदन द्वादशी। प्रदोष व्रत। अनंग त्रयोदशी व्रत। हरि दमनोत्सव। मंगल श्रवण नक्षत्र में 24/00 पर।   
06.सोम-श्री महावीर जयन्ती (जैन)।  मीनाक्षी कल्याणम्। शिव नृसिंह दमनकोत्सव (महानिशीथ काल में)। दमनक चतुर्दशी।     
07.मंगल-व्रत की पूर्णिमा। गुरु हरकिशन जोति जोत। श्री गुरु तेगबहादुर गुरयायी। बुध मीन राशि में 14/21 पर।   
08.बुध-स्नान-दान-व्रतादि की चित्रा नक्षत्रयुता परम पुण्यदायिनी चैत्री पूर्णिमा (परम पुण्यकाल 06/07 से 08/05 तक। चांडक पूजा (बंगाल)। अन्वाधान। मन्वादि 15। सर्वदेव दमनकोत्सव। श्री हनुमान जयंती (सूर्योदय काल में दक्षिण भारत एवं काशी के संकट मोचन मन्दिर में)। इष्टि। चित्रान्न दान-भक्षण। वैशाख कृष्ण पक्षारम्भ। वैशाख मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। तुलसी पत्र से श्री विष्णु पूजा। मास पर्यन्त पनिसरा चलाना चाहिये। (अशक्ति में धर्म घटादि दान)। मास भर चन्दन से श्री विष्णु पूजा। 01 तिथि क्षय। शुक्र रोहिणी नक्षत्र में 16/04 पर।
वैशाख कृष्ण पक्ष
09.गुरू-वैशाख कृष्ण पक्षारम्भ। शबे बरात। बुध उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में 19/20 पर। 
10.शुक्र-गुड फ्राइडे।
11.शनि-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 22/00 पर। सती अनसुइया जयन्ती। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। म्ेंजमत ;भ्वसलद्ध ैंजनतकंलण्  
12.रवि-श्री गुरु तेगबहादुर जयन्ती।
13.सोम-सूर्य अश्विनी नक्षत्र में एवं सूर्य की मेष संक्रान्ति 20/22 पर। चन्द्रदर्शन मु.30 साम्यर्घ। वैशाखी पंजाब एवं उड़ीसा। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल 16/22 से सूर्यास्त तक, सामान्य पुण्यकाल 13/58 से सूर्यास्त तक। सतुआ जल कुम्भादि दान। हरिद्वार या काशी के असी संगम पर स्नान। मीन (खर) मास समाप्त। बुधास्त पूर्व में 24/08 पर।
14.मंगल-श्री शीतलासप्तमी व्रत। कालाष्टमी। श्री गुरू अर्जुनदेव जयन्ती। भीमराव अम्बेडकर जयन्ती।  
15.बुध-श्री शीतलाष्टमी व्रत। पर्युषितान्न (बासी) भोजन करना विहित है। अष्टका। 
17.शुक्र-बुध रेवती नक्षत्र में 21/41 पर।
18.शनि-वरुथिनी एकादशी व्रत सबका। श्री वल्लभाचार्य जयन्ती।
19.रवि-सूर्य सायन वृष राशि में 20/05 पर।
20.सोम-सोम प्रदोष व्रत।
21.मंगल-मास शिवरात्रि व्रत। राष्ट्रीय वैशाख मासारम्भ।
22.बुध-श्राद्ध की अमावस्या। 14 तिथि वृद्धि।
23.गुरू-स्नान-दानादि की अमावस्या। बाबू कुँवर सिंह जन्म दिवस (बिहार)।
वैशाख शुक्ल पक्ष
24.शुक्र-इष्टि। वैशाख मास शुक्ल पक्षारम्भ। चन्द्रदर्शन मु.30 साम्यर्घ। देव दामोदर तिथि (आसाम)। गुरू अंगददेव जयन्ती। मंगल धनिष्ठा नक्षत्र में 28/53 पर। बुध अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में 26/34 पर।
25.शनि- भगवान परशुराम जयन्ती (प्रदोष काल व्यापिनी तृतीया में)। छत्रपति शिवा जी जयन्ती। हिजरी रमजान 9वां माह शुरु। रोजा शुरू।
26.रवि-अक्षय तृतीया। त्रेतायुगादि। पितृ पितामहादि के निमित्त सक्तु चीनी फल धर्म घटादि दान। त्रिलोचन दर्शन-यात्रा। बद्री केदार यात्रा। मातंगी जयन्ती। कल्पादि।
27.सोम-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। अगस्त्यास्त 13/27 पर। सूर्य भरणी नक्षत्र में 27/57 पर। शुक्र मृगशिरा नक्षत्र में 17/01 पर।  
28.मंगल-श्री आद्य शंकराचार्य जयन्ती। श्री सूरदास जयन्ती। श्री रामानुजाचार्य जयन्ती (दक्षिण भारत)।
29.बुध-श्री रामानुजाचार्य जयन्ती (उत्तर भारत में)। चन्दन षष्ठी (बंगाल)।
30.गुरू-श्री गंगा सप्तमी। गंगोत्पत्ति। गंगावतरण (मध्यान्ह में गंगा पूजन)।
मई 2020
01.शुक्र-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। श्री बगलामुखी जयन्ती। मई दिवस। श्रमिक दिवस (अखिल विश्व के मजदूरों का पर्व)। महाराष्ट्र एवं गुजरात दिवस। बुध भरणी नक्षत्र में 16/01 पर।  
02.शनि-श्री सीता नवमी। वैष्णव मतानुसार श्री जानकी जयन्ती। त्रिचूर पूरम (केरल)।
04.सोम-मोहिनी एकादशी व्रत सबका। परशुराम द्वादशी। रुक्मिणी द्वादशी। मंगल कुम्भ राशि में 20/40 पर। 12 तिथि क्षय।      
05.मंगल-भौम प्रदोष व्रत। अशोक त्रिरात्र व्रत। 
06.बुध-सायान्ह-व्यापिनी चतुर्दशी में श्री नृसिंह जयन्ती। श्री नृसिंह चतुर्दशी व्रत। श्री नृसिंहावतार। श्री छिन्नमस्ता जयन्ती। गुरू अमरदास जयन्ती।     
07.गुरू-स्नान-दान-व्रतादि की विशाखा नक्षत्रयुता परमपुण्यदायिनी वैशाखी पूर्णिमा (परमपुण्य काल 11/08 से 16 /15 तक)। अन्वाधान। कृष्ण मृग चर्म-तिल-सुवर्ण दान। यम (धर्मराज) के लिये जल कुम्भादि दान। सायंकाल कूर्म जयन्ती। कूर्मावतार। बुद्ध पूर्णिमा। बुद्ध परिनिर्वाण दिवस।  वैशाख मासीय व्रत-यम नियमादि समाप्त। रवीन्द्रनाथ टैगोर जयन्ती। बुध कृत्तिका नक्षत्र में 20/52 पर।
ज्येष्ठ कृष्ण पक्ष 
08.शुक्र-ज्येष्ठ मास कृष्ण पक्षारम्भ। ज्येष्ठ मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। माता आनन्दमयी जयन्ती।
09.शनि-देवर्षि नारद जयन्ती। वीणा-दान। बुध वृष राशि में 20/55 पर। 
10.रवि-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/47 पर। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक।  
11.सोम-सूर्य कृत्तिका नक्षत्र में 06/23 पर। शनि वक्री 09/38 पर।     
13.बुध-बुध रोहिणी नक्षत्र में 26/55 पर। शुक्र वक्री 12/15 पर।
14.गुरू-महापंचक प्रारम्भ 06/23 से। कालाष्टमी। सूर्य की वृष संक्रान्ति 17/16 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल 10/52 से संक्रान्ति काल तक, तत्पश्चात् सामान्य पुण्यकाल संक्रान्ति काल से सूर्यास्त तक। संकल्पादि में प्रयोजनीय ग्रीष्म ऋतु प्रारम्भ। गौ-अन्न-जल-तिल दान। गोदावरी में स्नान। मंगल शतभिषा नक्षत्र में 14/00 पर। बुध उदय पश्चिम में 10/21 पर। गुरू (वक्री) 20/02 पर।     
15.शुक्र-श्री शीतलाष्टमी व्रत। पर्युषितान्न (बासी) भोजन करना विहित है। श्री गुरु हरगोविन्द सिंह गुरयायी। शहादत हजरत अली।  
18.सोम-अचला एकादशी व्रत सबका। अपरा व्रत।
19.मंगल-भौम प्रदोष व्रत।
20.बुध-मास शिवरात्रि व्रत। सावित्री चतुर्दशी व्रत। फलहारिणी कालिका पूजन। पंच गौड़ों का त्रिदिनात्मक वट सावित्री व्रतारम्भ। वट सावित्री व्रत का प्रथम संयम। सूर्य सायन मिथुन राशि में 19/10 पर। बुध मृगशिरा नक्षत्र में 24/37 पर। राहु (वक्री) मृगशिरा नक्षत्र में 17/11 पर।    
21.गुरू-वट सावित्री व्रत का द्वितीय संयम। शबे कद्र।  
22.शुक्र-स्नान-दान-श्राद्धादि की अमावस्या। पंचगौड़ों का वट सावित्री व्रत। शनि जयन्ती। भावुका। बरगदाही। राष्ट्रीय ज्येष्ठ मासारम्भ। रमजान का आखिरी जुमा (जुमातुल विदा)।
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष
23.शनि-महापंचक समाप्त 28/52 पर। ज्येष्ठ मास शुक्ल पक्षारम्भ। करिदिन। भावुका करिदिन। करवीर व्रत। दस दिनात्मक गँगा दशहरा व्रतारम्भ। गँगा स्तोत्र का नित्य वृद्धि क्रम से पाठ। श्री गंगा दशाश्वमेध स्नान प्रारम्भ। 
24.रवि- चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। सोपपदा 2। वेदारम्भ में अनध्याय। सूर्य रोहिणी नक्षत्र में 26/33 पर। बुध मिथुन राशि में 23/58 पर। 
25.सोम-सायान्हव्यापिनी तृतीया में रम्भा व्रत। श्री महाराणा प्रताप की 480 वीं जयन्ती (राजस्थान)। हिजरी सव्वाल 10 वां माह शुरु। ईदुल फितर (ईद)।  
26.मंगल-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। श्री गुरु अर्जुनदेव बलिदान दिवस। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक।
28.गुरू-विन्ध्यवासिनी षष्ठी। अरण्य षष्ठी (बंगाल)। जामात्रि षष्ठी (बंगाल)। शुक्र (वक्री) रोहिणी नक्षत्र में 12/28 पर।
29.शुक्र-बुध आर्द्रा नक्षत्र में 14/07 पर। 
30.शनि-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। अष्टमी तिथि में शुक्लादेवी का आवाहन। धूमावती जयन्ती। मेला क्षीर भवानी (काश्मीर)। 
31.रवि-नवमी में उपोषण करके शुक्ला देवी का पूजन। शुक्र अस्त पश्चिम में 05/41 पर। 
जून 2020
01.सोम-गंगा दशमी। श्री गंगा दशहरा। गंगा जन्म लग्न 2 (वृष)। दस दिनात्मक गंगा दशहरा व्रत समाप्त। सेतु बन्ध श्री रामेश्वर प्रतिष्ठा दिवस। श्री रामेश्वर यात्रा, दर्शन, पूजन।
02.मंगल-निर्जला एकादशी व्रत सबका। भीमसेनी एकादशी। चीनी सुवर्ण सहित दान। काशी के दशाश्वमेध-घाट से श्री विश्वनाथ मंदिर तक कलश यात्रा, दर्शन एवं पूजन। गायत्री जयन्ती। रुक्मिणी विवाह (उड़ीसा)।
03.बुध-चम्पक द्वादशी। द्वादशी में त्रिविक्रम पूजा। प्रदोष व्रत। दाक्षिणात्यों का त्रिदिनात्मक वट सावित्री व्रतारम्भ। दाक्षिणात्यों के वट सावित्री व्रत का प्रथम संयम। मंगल पूर्वाभाद्रपद नक्षत्र में 09/40 पर। 
04.गुरू-दाक्षिणात्यों के वट सावित्री व्रत का द्वितीय संयम। 14 तिथि क्षय।
05.शुक्र-स्नान-दान-व्रतादि की ज्येष्ठा नक्षत्रयुता परमपुण्यदायिनी ज्येष्ठी पूर्णिमा (परमपुण्य काल 16/44 से सूर्यास्त तक)। दाक्षिणात्यों का वट सावित्री व्रत (ज्येष्ठी योग)। मन्वादि। बिल्व त्रिरात्र। जलयात्रा। देव स्नान पूर्णिमा। संत कबीर दास जयन्ती। ज्येष्ठ मासीय यम-नियमादि समाप्त। अब्द साध्य व्रत।
आषाढ़ कृष्ण पक्ष
06.शनि-आषाढ़ मास कृष्ण पक्षारम्भ। इष्टि। आषाढ़ मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। वट सावित्री व्रत का पारण।
07.रवि-श्री गुरु हरगोविन्द सिंह जन्म दिवस। सूर्य मृगशिरा नक्षत्र में 24/28 पर।    
08.सोम-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/26 पर। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। शुक्र उदय पूर्व में 19/19 पर। 
13.शनि-कालाष्टमी। श्री शीतलाष्टमी। पर्युषितान्न (बासी भोजन करना विहित है)।     
14.रवि-सूर्य की मिथुन संक्रान्ति 23/54 पर। चन्द्रदर्शन मु.45 समर्घ। संक्रान्ति का सामान्य पुण्यकाल 17/30 से संक्रान्ति काल तक, तत्पश्चात् विशेष पुण्यकाल  अगले दिन। गौ, अन्न, वस्त्र दान, मन्दाकिनी में स्नान। बुध पुनर्वसु नक्षत्र में 09/21 पर।   
15.सोम-संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल  सूर्योदय से घं.06 मि.18 तक। गौ, अन्न, वस्त्र दान, मन्दाकिनी में स्नान।
16.मंगल-10 तिथि वृद्धि।
17.बुध-योगिनी एकादशी व्रत सबका। परम पूज्य श्री देवरहा बाबा की पुण्य तिथि। गोपदम् व्रत का उद्यापन।  
18.गुरू-प्रदोष व्रत। मंगल मीन राशि में 20/15 पर। बुध वक्री 10/27 पर।
19.शुक्र-मास शिवरात्रि व्रत।
20.शनि-श्राद्ध की अमावस्या। सूर्य सायन कर्क राशि में 27/09 पर। सायन सूर्य दक्षिणायन। सायन वर्षा ऋतु प्रारम्भ। दैत्यों की मध्य रात्रि एवं देवताओं का मध्यान्ह। विराज दिन। ऐतरेय ब्राह्मण।
21.रवि-स्नान-दानादि की अमावस्या। अन्वाधान। सूर्य ग्रहण। अयन करिदिन। सूर्य आर्द्रा नक्षत्र में 23/28 पर। चन्द्र-चन्द्र, स्त्री-स्त्री योग, वाहन अश्व, सौम्या नाड़ी, तदीश गुरू (पुरूष), अतः श्रेष्ठ वर्षा हो। बुध अस्त पश्चिम में 09/17 पर। 
आषाढ़ शुक्ल पक्ष
22.सोम-आषाढ़ मास शुक्ल पक्षारम्भ। चन्द्र दर्शन मु.45 समर्घ। ग्रहण करिदिन। राष्ट्रीय आषाढ़ मासारम्भ। बुध (वक्री) आर्द्रा नक्षत्र में 13/12 पर। 
23.मंगल-पुष्य नक्षत्रयुता रथयात्रा। जगन्नाथपुरी यात्रा दर्शन प्रदक्षिणा। श्री बलराम जगदीश रथोत्सव। मनोरथ द्वितीया (बंगाल)। हिजरी जिल्काद 11वां माह शुरु। मंगल उत्तराभाद्रपद नक्षत्र में 28/11 पर।
25.गुरू-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। शुक्र मार्गी 12/19 पर।
26.शुक्र-स्कन्द षष्ठी व्रत। कुमार षष्ठी। कर्दम षष्ठी। 06 तिथि क्षय।
27.शनि-विवस्वत सप्तमी। विवस्वत सूर्य पूजा।
28.रवि-महाष्टमी व्रत। श्री दुर्गाष्टमी व्रत। खार्ची पूजा (त्रिपुरा)।
29.सोम-कन्दर्प नवमी। भड्डली। शूद्रादि।
30.मंगल-सोपपदा। मन्वादि। वेदारम्भ में अनध्याय। पुनर्यात्रा। उल्टा रथ (उड़ीसा)। बहुधा यात्रा। गिरिजा पूजा। आशा दशमी। मेला शरीक भगवती (कश्मीर)। गुरू (वक्री) धनु राशि में 05/21 पर।
जुलाई 2020  
01.बुध-हरिशयनी एकादशी व्रत सबका। चातुर्मास्य व्रतारम्भ। चातुर्मास्य व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। रात्रि में विष्णु पूजा। शाक-त्याग व्रतारम्भ। गोपद्म व्रत का उद्यापन। हरिवासर 26/34 से।
02.गुरू-प्रदोष व्रत। हरिवासर 15/18 तक।
03.शुक्र-जया पार्वती व्रत। सायँकाल चतुर्दशी में श्री शिव शयनोत्सव।
04.शनि-व्रत की पूर्णिमा। कोकिला पूर्णिमा। प्रदोष व्यापिनी पूर्णिमा में कोकिला रुपिणी शिवा का पूजन। वायु परीक्षा।  
05.रवि-स्नान-दानादि की पूर्वाषाढ़ा नक्षत्रयुता परमपुण्यदायिनी आषाढ़ी पूर्णिमा (परमपुण्य काल सूर्योदय से 10/15 तक)। गुरु पूर्णिमा। गुरु व्यास पूजा। मन्वादि। बौधायन श्रावणी उपाकर्म। कर्णघन्टा (कनखल) तीर्थ में स्नान। सन्यासियों का चातुर्मास्य व्रतारम्भ। करिदिन। अन्वाधान। गोपद्म व्रतारम्भ। सारनाथ में बौद्ध भिक्षुओं का धर्म चक्र प्रवर्तन दिवस। बौद्ध भिक्षुओं का वर्षा वास ग्रहण। मेला ज्वालामुखी (कश्मीर)। आषाढ़ मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त। सूर्य पुनर्वसु नक्षत्र में 23/03 पर। चन्द्र-चन्द्र, स्त्री-पुरूषी योग, वाहन चातक, नाड़ी नीरा, तदीश शुक्र (स्त्री) अतः वर्षा श्रेष्ठ हो।  
श्रावण कृष्ण पक्ष
06.सोम-श्रावण मास कृष्ण पक्षारम्भ। श्रावणमासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। श्रावण मास में शाक त्याग करना चाहिये। नक्त व्रतारम्भ। अशून्य शयन द्वितीया व्रत (चन्द्रोदयव्यापिनी द्वितीया में)। श्रावण सोमवार व्रत।
07.मंगल-बृहत्तल्पा। भौम व्रत, गौरी दुर्गा पूजा। संकटमोचन में हनुमद्-दर्शन, श्री दुर्गा जी की यात्रा एवं दर्शन-काशी में।  
08.बुध-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/32 पर।  ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। 
10.शुक्र-श्री नागपंचमी व्रत (मरुस्थल एवं बंगाल में)।
11.शनि-बुध उदय पूर्व में 07/04 पर।          
12.रवि-बुध मार्गी 13/57 पर।
13.सोम-श्रावण सोमवार व्रत। 
14.मंगल-भौम व्रत, गौरी दुर्गा पूजा। संकटमोचन में हनुमद्-दर्शन, श्री दुर्गा जी की यात्रा एवं दर्शन-काशी में। श्री गुरु हरकिशन जयन्ती। 
16.गुरू-कामदा एकादशी व्रत सबका। सूर्य की कर्क संक्रान्ति 10/47 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय से संक्रान्ति काल तक, तत्पश्चात् सामान्य पुण्यकाल संक्रान्ति काल से 17/11 तक। घृत-धेनु दान। मन्दाकिनी में स्नान। संकल्पादि में प्रयोजनीय वर्षा ऋतु प्रारम्भ। निरयण सूर्य दक्षिणायन। मंगल रेवती नक्षत्र में 27/34 पर। 
18.शनि-शनि प्रदोष व्रत।   
19.रवि-मास शिवरात्रि व्रत। सूर्य पुष्य नक्षत्र में 22/36 पर। चन्द्र-चन्द्र, स्त्री-स्त्री योग। वाहन नाग, नाड़ी नीरा, तदीश शुक्र (स्त्री), अतः अल्प वृष्टि हो।
20.सोम-स्नान-दान-श्राद्धादि की सोमवती अमावस्या (आज तैल स्पर्श का निषेध है)। हरियाली अमावस्या। चितलगी अमावस्या। आदि अमावस्या (तमिलनाडु)/कर्कटक बवु (केरल)। अन्वाधान। श्रावण सोमवार व्रत।
श्रावण शुक्ल पक्षारम्भ
21.मंगल-श्रावण मास शुक्ल पक्षारम्भ। इष्टि। आज से भाद्रपद शुक्ल 1 तक नक्त व्रतारम्भ। भौम व्रत, गौरी दुर्गा पूजा। संकटमोचन, श्री दुर्गा जी की यात्रा एवं दर्शन-काशी में। 
22.बुध-चन्द्र-दर्शन मु.30 साम्यर्घ। श्रृंगार (सिंधारा) देशाचार से। सूर्य सायन सिंह राशि में 14/08 पर। 
23.गुरू-सुकृत तृतीया। मधुश्रवा तृतीया व्रत (मैथिल गुर्जर देश में प्रसिद्ध)। हरि तृतीया (हरियाली तीज)। स्वर्ण गौरी व्रत। ब्रह्मलीन धर्म-सम्राट् यतिचक्र चूड़ामणि पूज्य चरण-रज स्वामी करपात्रि जी महाराज जयन्ती। राष्ट्रीय श्रावण मासारम्भ। अमर शहीद चन्द्रशेखर आजाद जयन्ती। हिजरी जिल्हेज 12वाँ माह शुरू। शुक्र मृगशिरा नक्षत्र में 19/58 पर।
24.शुक्र-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। वरद चतुर्थी व्रत। दूर्वा गणपति व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। 
25.शनि-श्री नाग पंचमी व्रत (मध्यान्ह व्यापिनी पंचमी में)। नागपूजा एवं नागकूप यात्रा। तक्षक पूजा। गोबर आदि से भित्ति पर बने नागों की पूजा। श्री हनुमान जी का ध्वजारोपण। ग्राम-ग्राम में विविध प्रकार के व्यायामों का प्रदर्शन। नागदृष्ट व्रत। कल्कि जयन्ती (सायान्ह व्यापिनी षष्ठी में)। वर्ण श्रृयाल षष्ठी व्रत। 
26.रवि-श्री शीतलाषष्ठी व्रत। बुध पुनर्वसु नक्षत्र में 10/34 पर। गुरू (वक्री) पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 15/24 पर।  
27.सोम-श्री शीतलासप्तमी पूजन व्रत। गोस्वामी श्री तुलसीदास जयन्ती। श्री दुर्गाष्टमी व्रत। रोटक व्रतारम्भ। सोमेश्वर पूजन। श्री वर महालक्ष्मी व्रत (दक्षिण भारत)। श्रावण सोमवार व्रत। 08 तिथि क्षय।
30.गुरू-पुत्रदा एकादशी व्रत सबका। पवित्रा। झूलन यात्रारम्भ (पूर्वान्ह में)।  
31.शुक्र-श्री विष्णु पवित्रारोपण। आज से भाद्रपद शुक्ल 12 तक दधि त्याग व्रतारम्भ। शुक्र मिथुन राशि में 29/10 पर।
अगस्त 2020     
01.शनि-शनि प्रदोष व्रत। लोकमान्य तिलक पुण्यतिथि। ईदुज्जुहा (बकरीद)। बुध कर्क राशि में 27/31 पर। 
02.रवि-सूणमाण्डणा (पूरा दिन शुद्ध है)। सूर्य आश्लेषा नक्षत्र में 21/28 पर। चन्द्र-चन्द्र, स्त्री-पुरूष योग, वाहन मेष, नीरा नाड़ी, तदीश शुक्र (स्त्री), अतः श्रेष्ठ वृष्टि हो। 
03.सोम-स्नान दान व्रतादि की श्रवण नक्षत्रयुता परमपुण्यदायिनी श्रावणी पूर्णिमा (परमपुण्य काल 07/19 से सूर्यास्त तक)। अन्वाधान। रक्षा बन्धन (राखी) पूर्णिमा (भद्रा के बाद)। सायंकाल हयग्रीवोत्पत्ति, हयग्रीव जयन्ती। भदैनी स्थित मन्दिर में हयग्रीव दर्शन-पूजन। ऋषि तर्पण। आपस्तम्ब उपाकर्म। संस्कृत दिवस। सत्याग्रह बलिदान दिवस। अमरनाथ यात्रा दर्शन पूजन। प्रदोष काल में नारली पूर्णिमा। यजुर्वेदियों, अथर्ववेदियों, काण्वमाध्यनन्दिन (कात्यायन), बौधायन, हिरण्यकेशीय, आपस्तम्ब, तैत्तरीय द्विजातियों का श्रावणी उपाकर्म। झूलन यात्रा समापन। झूलन पूर्णिमा। नारियल। बलभद्र पूजा (उड़ीसा)। भारतीय संगीत के पुनरूद्धारक विष्णु दिगम्बर पलुष्कर जयन्ती। श्रावणमासीय व्रत यम नियमादि समाप्त। बुध पुष्य नक्षत्र में 24/27 पर।  
भाद्रपद मास कृष्ण पक्षारम्भ 
04.मंगल-भाद्रपद मास कृष्ण पक्षारम्भ। इष्टि। भाद्रपद मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। अशून्य शयन द्वितीया 2 व्रत। भाद्रपद मास में दधित्याग करना चाहिये। मट्ठा का निषेध नहीं है। ऋग्वेदीय उपाकर्म।
05.बुध-कज्जली निमित्त जागरण।
06.गुरू-कज्जली तृतीया व्रत। कजरी तीज। तीजड़ी (सिन्धी)।   
07.शुक्र-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 21/13 पर। बहुला चतुर्थी। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। बुध अस्त पूर्व में 14/53 पर।
08.शनि-शुक्र आर्द्रा नक्षत्र में 17/57 पर।
09.रवि-हलषष्ठी व्रत (सायान्हव्यापिनी षष्ठी में)। पुत्रार्थियों को एवं सन्तानवती महिलाओं को यह व्रत करना चाहिये। बृहद् गौरी व्रत। कपिला षष्ठी व्रत। चम्पा षष्ठी। चन्द्रषष्ठी व्रत (मरूस्थल में)।
10.सोम-श्री शीतला सप्तमी व्रत। 06 तिथि वृद्धि। बुध आश्लेषा नक्षत्र में 19/50 पर। 
11.मंगल-श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत स्मार्त। श्री कृष्ण जन्मोत्सव। मन्वादि। मंत्रादि।
12.बुध-श्री कृष्ण जन्माष्टमी व्रत वैष्णव। श्री सन्त ज्ञानेश्वर जयन्ती। गोकुलाष्टमी। नन्दोत्सव।
13.गुरू-गोगा नवमी। 
15.शनि-जया एकादशी व्रत सबका। गो-वत्स पूजा द्वादशी। पर्युषण पर्वारम्भ (जैन)। भारतीय स्वतंत्रता दिवस। भारतीय स्वतंत्रता दिवस की 74वीं वर्षगाँठ।
16.रवि-प्रदोष व्रत। सूर्य मघा नक्षत्र में एवं सूर्य की सिंह संक्रान्ति 19/11  पर। चन्द्र दर्शन मु.45 समर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल 12/47 से सूर्यास्त तक। छत्र-स्वर्ण, वस्त्र-दान, गँगा में स्नान। सूर्य मघा नक्षत्र में चन्द्र-चन्द्र, स्त्री-स्त्री योग, वाहन महिष, नाड़ी नीरा, तदीश शुक्र (स्त्री) अतः अल्प वृष्टि हो। मंगल अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में 18/28 पर। 
17.सोम-मास शिवरात्रि व्रत। बुध मघा नक्षत्र सिंह राशि में 08/29 पर।    
18.मंगल-श्राद्ध की अमावस्या। पिठौरी अमावस्या। कुशोत्पाटिनी अमावस्या। ‘ओम् हूँ फट्’ मन्त्र से कुशोत्पाटन।
19. बुध-स्नान-दानादि की अमावस्या। लोहार्गल स्नान। श्री शक्ति पूजा। पोला (वृषभोत्सव)। मौन व्रतारम्भ (जैन)। भाद्रपद शुक्ल पक्षारम्भ। श्रावण मासीय नक्त व्रत का अन्तिम दिन। श्री गुरू ग्रन्थ साहब प्रथम प्रकाश दिवस। 01 तिथि क्षय।   
भाद्रपद शुक्ल पक्षारम्भ
20.गुरू-भाद्रपद शुक्ल पक्षारम्भ। चन्द्रदर्शन मु.30 साम्यर्घ। श्रावण मासीय नक्त व्रत का अन्तिम दिन (देशाचार से)। श्री गुरू अर्जुनदेव गुरयायी। 
21.शुक्र-हरितालिका तीज व्रत (स्त्रियों को यह व्रत अवश्य करना चाहिये)। वाराह जयन्ती। मन्वादि। वाराहावतार। बृहदगौरी व्रत। गौरी तृतीया। श्री शंकर देव तिथि (आसाम)। श्री गुरू रामदास जोति जोत। हिजरी मोहर्रम 1 माह शुरू। हिजरी सन् 1442 शुरू।
22.शनि-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। (आज चन्द्र दर्शन का निषेध है)। सिद्ध विनायक चतुर्थी 4। पत्थर चौथ। भाद्रपद सिंहार्क हस्त नक्षत्र में सामवेदियों का उपाकर्म। सम्वत्सरी चतुर्थी पक्ष (जैन)। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। मेला पाट 3 दिन (जम्मू-कश्मीर)। सूर्य सायन कन्या राशि में 21/21 पर। शुक्र पुनर्वसु नक्षत्र में 11/21 पर।
23.रवि-ऋषि पंचमी। मध्यान्ह में सप्तर्षि पूजा। आपस्तम्भ श्रावणी। हेमाद्रिका नाग पंचमी। ललिता षष्ठी व्रत (गुर्जर)। सम्वत्सरी महापर्व (जैन)। राष्ट्रीय भाद्रपद मासारम्भ। बुध पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 28/01 पर।
24.सोम-सूर्य षष्ठी व्रत। लोलार्क षष्ठी। पुत्रार्थियों को आज से 16 दिन तक काशी के लोलार्क कुण्ड में स्नान एवँ पूजन अर्चन करना चाहिये। मुक्ताभरण सप्तमी व्रत। दूबड़ी सातम। उमा महेश्वर पूजन।
25.मंगल-अपराजिता। संतान। श्री राधाष्टमी। दूर्वाष्टमी। अनुराधा नक्षत्र में ज्येष्ठा गौरी का आवाहन 13/59 के बाद।  
26.बुध-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। श्री राधाष्टमी। दूर्वाष्टमी (देशाचार से)। आज से 16 दिनात्मक महालक्ष्मी व्रतारम्भ। महर्षि दधीचि जयन्ती। ज्येष्ठा नक्षत्र में ज्येष्ठा गौरी का पूजन-व्रत 13/04 के बाद।
27.गुरू-श्री चन्द्र नवमी। अदुःख नवमी। उदासीन सम्प्रदाय महोत्सव। भागवत सप्ताहारम्भ। गौरी गणपति पूजन। काशी के लक्ष्मी कुण्ड में स्नान। मूल नक्षत्र में ज्येष्ठा गौरी का विसर्जन 12/37 के बाद। दशावतार दशमी 10 व्रत। अगस्त्योदय 18/42 पर। 
28.शुक्र-श्री रामदेव जी का मेला (नवल दुर्ग)।  
29.शनि-जल झूलनी व्रत सबका। डोल ग्यारस (म. प्र.)। वामन द्वादशी व्रत। वामनावतार। वामन जयन्ती।
30.रवि-प्रदोष व्रत। गो त्रिरात्र व्रत। दुग्ध व्रत। हरिवासर का अभाव है। मोहर्रम (ताजिया)। सूर्य पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 15/06 पर। सूर्य-चन्द्र, स्त्री-पुरूष योग, वाहन मण्डूक, अमृता नाड़ी, तदीश चन्द्र (स्त्री), अतः बहुत हवा चले वृष्टि खूब हो।  
31.सोम-गुरू रामदास गुरयाई दिवस। बुध उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में 13/11 पर। शुक्र कर्क राशि में 26/03 पर।
सितम्बर 2020 
01.मंगल-अनन्त चतुर्दशी व्रत। कदली व्रत पूजन। रम्भा रोपण। व्रत की पूर्णिमा। इन्द्र श्राद्धारम्भ। प्रौष्ठपदी पूर्णिमा। महालयारम्भ। पितृ पक्ष आरम्भ। पूर्णिमा श्राद्ध (09/39 के बाद)। 
02.बुध-स्नान-दानादि की भाद्रपदी पूर्णिमा। इंदुला 15। प्रतिपदा श्राद्ध (10/52 के बाद)। उमा महेश्वर पूजन-व्रत। कु. संध्या पूजा। भाद्रपद मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त। इष्टि। गुरू अमरदास जी जोति जोत। बुध कन्या राशि में 12/04 पर।
प्रथम (शुद्ध) आश्विन कृष्ण पक्ष    
03.गुरू-आश्विन मास कृष्ण पक्षारम्भ। आश्विन मास में दूध का त्याग करना चाहिये। अशून्य शयन द्वितीया व्रत। आश्विन मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। पितृ पक्षारम्भ (मतान्तर से)। शुक्र पुष्य नक्षत्र में 28/49 पर।
04.शुक्र-द्वितीया श्राद्ध 14/24 के पूर्व)।
05.शनि-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 20/16 पर। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। तृतीया श्राद्ध (16/39 के पूर्व)।   
06.रवि-चतुर्थी श्राद्ध।   
07.सोम-पंचमी श्राद्ध। भरणी श्राद्ध। चंद्र षष्ठी व्रत। गुरू अंगददेव गुरयाई दिवस। बुध उदय पश्चिम में 11/51 पर।
08.मंगल-षष्ठी श्राद्ध। बुध हस्त नक्षत्र में 15/53 पर।   
09.बुध-सप्तमी श्राद्ध।  
10.गुरू-अष्टमी श्राद्ध। जीवित्पुत्रिका (जीउतिया) व्रत। अशोकाष्टमी। श्री महालक्ष्मी व्रत। कालाष्टमी 8। मंगल वक्री 20/24 पर। 
11.शुक्र-मातृ नवमी। नवमी श्राद्ध। सौभाग्यवती स्त्रियों का श्राद्ध आज ही करना चाहिये। जीवित्पुत्रिका व्रत का पारण।
12.शनि-दशमी श्राद्ध। गुरू नानकदेव जी जोति जोत।
13.रवि-इन्दिरा एकादशी व्रत सबका। एकादशी श्राद्ध। सूर्य उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में 09/02 पर। सूर्य-चन्द्र, स्त्री-स्त्री योग, वाहन चातक, नाड़ी नीरा, तदीश शुक्र (स्त्री) अतः अल्प वर्षा हो। गुरू मार्गी 06/11 पर।
14.सोम-द्वादशी श्राद्ध। चक्रांकित महाभागवतों का, सन्यासी, यति, वैष्णवों का श्राद्ध आज ही करना चाहिये।   
15.मंगल-भौम प्रदोष व्रत। युगादि। मास शिवरात्रि व्रत। त्रयोदशी श्राद्ध।
16.बुध-मघा श्राद्ध। चतुर्दशी श्राद्ध। शस्त्रादि से मृत लोगों का श्राद्ध आज ही करना चाहिये। सूर्य की कन्या संक्रान्ति 19/07 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का सामान्य पुण्यकाल 12/43 से सूर्यास्त तक। गृह-वस्त्र दान, गोदावरी में स्नान, संकल्पादि में प्रयोजनीय शरद ऋतु प्रारम्भ। शुक्र आश्लेषा नक्षत्र में 07/45 पर। 
17.गुरू-स्नान-दान-श्राद्धादि की अमावस्या। अमावस्या श्राद्ध। पितृ विसर्जन। महालया समाप्त। सर्वपैत्री। अज्ञात तिथि वालों का श्राद्ध आज ही करना चाहिये। विश्वकर्मा पूजा। अधिक मासारम्भ। बुध चित्रा नक्षत्र में 16/45 पर।
प्रथम (अधिक) आश्विन शुक्ल पक्ष
18.शुक्र-चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। 
19.शनि-हिजरी सफर 2 माह शुरू। 03 तिथि क्षय
20.रवि-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। 
22.मंगल-सूर्य सायन तुला राशि में 19/09 पर। बुध तुला राशि में 16/56 पर।
23.बुध-राष्ट्रीय आश्विन मासारम्भ। राहु (वक्री) वृष राशि में 12/24 पर। केतु (वक्री) ज्येष्ठा नक्षत्र वृश्चिक राशि में 12/24 पर।
26.शनि-सूर्य हस्त नक्षत्र में 24/28 पर। सूर्य-चन्द्र, स्त्री-पुरूष योग, वाहन अश्व, अमृता नाड़ी, तदीश चन्द्र (स्त्री), अतः बहुत हवा के साथ श्रेष्ठ वृष्टि हो।     
27.रवि-कमला (पुरूषोत्तमी) एकादशी व्रत सबका। शुक्र मघा नक्षत्र सिंह राशि में 25/02 पर।  
28.सोम-बुध स्वाती नक्षत्र में 06/25 पर।
29.मंगल-भौम प्रदोष व्रत। शनि मार्गी 10/40 पर।
अक्टूबर 2020
01.गुरू-स्नान-दान-व्रतादि की पुरूषोत्तमी पूर्णिमा।
द्वितीय (अधिक) आश्विन कृष्ण पक्ष
02.शुक्र-महात्मा गाँधी जयन्ती। लालबहादुर शास्त्री जयन्ती। अधिक आश्विन मास कृष्ण पक्षारम्भ।
04.रवि-मंगल (वक्री) रेवती नक्षत्र मीन राशि में 18/05 पर। 
05.सोम-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 19/54 पर। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक।   
08.गुरू-चेहल्लुम।
09.शुक्र-शुक्र पूर्वाफाल्गुनी नक्षत्र में 11/17 पर।
10.शनि-सूर्य चित्रा नक्षत्र में 13/34 पर। सूर्य-चन्द्र, स्त्री-स्त्री योग, वाहन मण्डूक, नाड़ी नीरा, तदीश शुक्र (स्त्री) अतः अल्प वर्षा हो।   
13.मंगल-कमला (पुरूषोत्तमी) एकादशी व्रत सबका। बुध अस्त पश्चिम में 23/31 पर।
14.बुध-प्रदोष व्रत। बुध वक्री 06/35 पर। आखिरी चहार शम्बा।
15.गुरू-मास शिवरात्रि व्रत। 14 तिथि क्षय।
16.शुक्र-स्नान-दान-श्राद्धादि की अमावस्या। अधिक मास समाप्त। शहादते इमाम हसन।
द्वितीय (शुद्ध) आश्विन शुक्ल पक्ष
17.शनि-शारदीय नवरात्रारम्भ। कलश स्थापन। ध्वजारोहण। महाराजा अग्रसेन जयन्ती। दौहित्र कृत मातामह श्राद्ध। सूर्य की तुला संक्रान्ति 07/05 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय से 11/05 तक। संक्रान्ति का सामान्य पुण्यकाल आगे 13/29 तक। आज से वृश्चिक संक्रान्ति पर्यन्त तिल तेल का आकाश में दीपदान करना चाहिए। दीप, तिल गौ, रसादि दान। गोदावरी में स्नान। 
18.रवि-चन्द्र दर्शन मु.45 समर्घ।
19.सोम-हिजरी रवि उल अव्वल 3 माह शुरू।
20.मंगल-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। उपांग ललिता पंचमी 5 व्रत। ललिता पंचमी 5। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। शुक्र उत्तराफाल्गुनी नक्षत्र में 16/11 पर।
21.बुध-मूल नक्षत्र में सरस्वती देवी का आवाहन।
22.गुरू-पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में सरस्वती देवी का पूजन। सूर्य सायन वृश्चिक राशि में 28/37 पर। 
23.शुक्र-भद्रकाली अवतार। महाष्टमी। उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में सरस्वती देवी के निमित्त बलिदान। अन्नपूर्णा परिक्रमा प्रारम्भ 06/58 बजे से। ओली प्रारम्भ (जैन) चतुर्थी पक्ष। राष्ट्रीय कार्तिक मासारम्भ। सूर्य स्वाती नक्षत्र में 24/00 पर। सूर्य-चन्द्र, स्त्री-पुरूष योग, वाहन महिष, नीरा नाड़ी, तदीश शुक्र (स्त्री), अतः बहुत हवा के साथ श्रेष्ठ वृष्टि हो। शुक्र कन्या राशि में 10/45 पर। 
24.शनि-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। अष्टमी का हवनादि आज ही करें।  श्रवण नक्षत्र में सरस्वती देवी का विसर्जन। अन्नपूर्णा परिक्रमा समाप्त 07/00 बजे। ओली प्रारम्भ (जैन पंचमी पक्ष)। मन्वादि। श्री अष्टभुजी दुर्गा शक्ति पीठ (दुर्गा मंदिर) ‘वाई’ ब्लाक, किदवई नगर कानपुर में शतचण्डी यज्ञ का हवन पूर्णाहुति एवं महाप्रसाद वितरण। शक्ति संगीत सभा।   
25.रवि-श्री दुर्गानवमी व्रत। श्री महानवमी। नवमी का हवनादि आज ही करें। मन्वादि। श्री विजयादशमी। विजय मुहूर्त 13/47 से 14/29 तक। शमी पूजा। अपराजिता पूजा। नीलकण्ठ दर्शन। राजाओं का पट्टाभिषेक। बौद्धावतार। सीमोल्लंघन। शस्त्रादि पूजा। दशमी श्रवण नक्षत्र में राजाओं का पट्टाभिषेक।
27.मंगल-पापांकुशा एकादशी व्रत सबका। काशी में नाटी इमली का भरत मिलाप। श्री माधवाचार्य जयन्ती। बुध (वक्री) चित्रा नक्षत्र में 14/35 पर।
28.बुध-प्रदोष व्रत। कार्तिक मास के लिए द्विदल त्याग व्रतारम्भ।
30.शुक्र-शरद पूर्णिमा। लक्ष्मी पूजा। कुमार पूर्णिमा। कोजागरी पूर्णिमा व्रत। रात्रि में लक्ष्मी कुबेरादि पूजा। ईद-ए-मिलाद (बारावफात)। बुध उदय पूर्व में 29/15 पर। गुरू उत्तराषाढ़ा नक्षत्र में 13/00 पर  
31.शनि-स्नान-दान-व्रतादि की आश्विनी पूर्णिमा। अन्वाधान। नवान्न भक्षण। बंगदेशीय लखी पूजा। आश्वयुजी कर्म (आश्वलायन शाखा)। महर्षि बाल्मीकि जयन्ती। आश्विन मासीय स्नान-व्रत-यम-नियमादि समाप्त। आकाश दीपदान यज्ञ प्रारम्भ। आज से कार्तिक मास पर्यन्त आकाश में दीपदान करना चाहिए। ओली समाप्त (जैन)। कार्तिक मासीय व्रत-यम नियमादि प्रारम्भ। इष्टि। शुक्र हस्त नक्षत्र में 17/09 पर।
नवम्बर 2020
कार्तिक कृष्ण पक्ष

01.रवि-कार्तिक मास कृष्ण पक्षारम्भ। कार्तिक मासीय व्रत-यम नियमादि प्रारम्भ। कार्तिक मास में द्विदल (दाल) का त्याग करना चाहिए। तुलसीदल से श्री विष्णु पूजा।  
02.सोम-अशून्य शयन द्वितीया 2 व्रत।
03.मंगल-बुध मार्गी 23/20 पर।
04.बुध-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 19/57 पर। करवा चौथ। करक चतुर्थी व्रत। दशरथ चतुर्थी। दशरथ ललिता व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। ईद-ए-मौलाद। 
06.शुक्र-स्कन्द षष्ठी व्रत। सूर्य विशाखा नक्षत्र में 08/14 पर। 05 तिथि वृद्धि।      
08.रवि-अहोई अष्टमी व्रत सबका (सायं कालीन अष्टमी में)।
09.सोम-श्री गुरु हरराय जोति जोत। श्री गुरु हरकिशन गुरयायी। 09 तिथि क्षय।
11.बुध-रम्भा एकादशी व्रत सबका। आज आकाश में दीपदान करना चाहिये। बुध स्वाती नक्षत्र में 21/34 पर। डशुक्र चित्रा नक्षत्र में 15/01 पर।
12.गुरू-गोवत्स पूजा। गो वत्स द्वादशी (प्रदोष व्यापिनी द्वादशी में) नारी कर्त्तक नीरांजन विधि 5 दिन तक। वसु द्वादशी। धन त्रयोदशी। धनतेरस (देशाचार से)। धन्वन्तरि जयन्ती। यम पंचकारम्भ।
13.शुक्र-प्रदोष व्रत। धन त्रयोदशी। धनतेरस। श्री हनुमान जयन्ती। हनुमान जी का जन्म सायं मेष लग्न में (हनुमान जी का दर्शन पूजन)। नरक चतुर्दशी व्रत। रुप चतुर्दशी। सायँ प्रदोष वेला में देवालयों में दीपदान तत्पश्चात् घर में दीपदान करना चाहिए। कामेश्वरी जयन्ती। मास शिवरात्रि व्रत। काली चतुर्दशी (महानिशीथ काल में)। निशामुख में यम के लिए घर से बाहर दीपदान। गो त्रिरात्र व्रत प्रारम्भ। अरुणोदय काल पंचकारम्भ।
14.शनि-श्राद्ध की अमावस्या। दीपावली। प्रातः हनुमद्दर्शन। प्रदोष काल में लक्ष्मीन्द्र-कुबेरादि पूजा (प्रदोष काल 17/10 से 19/48 तक। खाता (बसना पूजा) महानिशीथ काल में महालक्ष्मी पूजा। महाकाली पूजा। महानिशीथ काल 23/14 से 24/06 बजे तक। शेष रात्रि में दरिद्र निःस्सारण। महावीर निर्वाण दिवस (जैन)। स्वामी रामतीर्थ जन्म एवं निर्वाण दिवस। ऋषि बोधोत्सव। स्वामी दयानन्द निर्वाण दिवस। गौरी-केदार व्रत। जवाहरलाल नेहरू जन्म दिवस, बाल दिवस। मंगल मार्गी 19/02 पर।
15.रवि-स्नान-दानादि की अमावस्या। अन्नकूट। गोवर्धन पूजा। बलि पूजा। बलि प्रतिपदा। सायं प्रदोष बेला में बलिपूजा। सायं द्यूत क्रीड़ा। यष्टिकार्षण। नारीकर्त्तक नीरांजन विधि समाप्त। यम पंचक समाप्त। गौ-क्रीड़ा। गो-संवर्धन सप्ताह प्रारम्भ। मार्गपाली बंगाल।
कार्तिक शुक्ल पक्ष
16.सोम-चन्द्र दर्शन मु.15 महर्घ। भ्रातृ द्वितीया। यम द्वितीया। चित्रगुप्त पूजा। यम पूजा दीप दानादि। यमुना स्नान। कलम दावात पूजन। भैया दूज। भगिनी गृह में भोजन। विश्वकर्मा पूजा (तिथि अनुसार) श्री गुरू ग्रन्थ साहब गुरयायी दिवस। 02 तिथि क्षय। सूर्य की वृश्चिक संक्रान्ति 06/54 पर। चन्द्र दर्शन मु.30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का विशेष पुण्यकाल सूर्योदय से संक्रान्ति काल तक तत्पश्चात् सामान्य पुण्यकाल संक्रान्ति काल से 13/18 तक। दीप वस्त्र, दान, नर्मदा में स्नान, संकल्पादि में प्रयोजनीय हेमन्त ऋतु प्रारम्भ। आकाश दीप-दान समाप्त। नेपाली संवत् 1141 वीर निर्वाण संवत् 2547 प्रारम्भ। गुर्जर नव सम्वत्सरारम्भ 2077। शुक्र तुला राशि में 25/02 पर।   
17.मंगल-हिजरी रवि उस्सानी 04 माह शुरू।
18.बुध-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। दूर्वा गणपति व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। सूर्य षष्ठी व्रत का प्रथम संयम।
19.गुरू-सौभाग्य पंचमी व्रत। पाण्डव पंचमी। ज्ञान पंचमी (जैन)। सूर्य षष्ठी व्रत का द्वितीय संयम (एक भुक्त खरना)। सतगुरू श्री गुरू गोविन्द सिंह जोति जोत। सूर्य अनुराधा नक्षत्र में 14/12 पर।
20.शुक्र-सूर्य षष्ठी व्रत (डाला छठ)। सायंकाल प्रथमार्घ्य दान। अरुणोदय काल में द्वितीयार्घ्य दान। गुरू मकर राशि में 13 18 पर 
21.शनि-कल्पादि। सूर्य षष्ठी व्रत का पारण। सूर्य सायन धनु राशि में 26/13 पर। बुध विशाखा नक्षत्र में 18/28 पर।  
22.रवि-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। श्री गोपाष्टमी। गो-पूजा एवं श्रृंगार। गायों को यवन्नादि दान। गो संवर्धन सप्ताह समाप्त। राष्ट्रीय मार्गशीर्ष मासारम्भ। शुक्र स्वाती नक्षत्र में 10/35 पर।      
23.सोम-अक्षय नवमी व्रत। जगद्धात्री पूजा। कूष्माण्ड नवमी। त्रेता युगादि (मतान्तर से)। स्वर्णयुक्त कूष्माण्ड दान। मथुरा प्रदक्षिणा। विष्णु त्रिरात्रारम्भ। विष्णु प्रतिमा सहित तुलसी पूजा द्वादशी तक, तत्पश्चात् प्रतिमादान। धातृ (आँवला) वृक्ष की परिक्रमा-पूजन-तर्पण, तत्पश्चात् आँवला वृक्ष के नीचे भोजन। 
25.बुध-प्रबोधिनी एकादशी व्रत सबका। देवोत्थानी एकादशी। तुलसी विवाहरम्भ। ईख रस का प्राशन। भीष्म पंचकारम्भ। तुलसी विवाहोत्सव। श्री विष्णु त्रिरात्र समाप्त। चातुर्मास्य व्रत-यम-नियमादि समाप्त। द्विदल (दाल) दान। हरिवासर 29/11 से।
26.गुरू-मन्वादि। कवि कुलगुरु कालिदास जयन्ती। हरिवासर 21/21 तक।
27.शुक्र-प्रदोष व्रत। फातिहा यजदहूम।
28.शनि-रोटक व्रत समाप्त। निशीथ काल व्यापिनी चतुर्दशी में वैकुण्ठ चतुर्दशी 14 व्रत। अरुणोदय काल में मणिकर्णिका घाट पर स्नान। निशीथ काल में महाविष्णु पूजा। श्री काशी विश्वनाथ प्रतिष्ठा दिवस। नर्मदेश्वर शिवलिंग को तुलसी पत्र समर्पण। बुध वृश्चिक राशि में 07/04 पर।
29.रवि-व्रत की पूर्णिमा। कार्तिक व्रतोद्यापन। त्रिपुरोत्सव। त्रिपुरा पूर्णिमा। पुष्कर मेला (अजमेर)।
30.सोम-स्नान-दानादि की कार्तिकी पूर्णिमा। मत्स्यावतार। मन्वादि। रास पूर्णिमा। रथयात्रा (जैन)। मन्वादि। भृगु आश्रम (बलिया) ददरी में स्नान का विशेष महत्व है। चातुर्मास्य समाप्त। (जैन)। श्री निम्बार्क जयन्ती। श्री गुरु नानक जयन्ती। कार्तिकेय दर्शन। हरिहर क्षेत्र का मेल (सोनपुर)। भीष्म पंचक समाप्त। कार्तिक मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त। गोपद्म व्रत समाप्त। बुध अनुराधा नक्षत्र में 10/30 पर। बुध अस्त पूर्व में 07/20 पर।
दिसम्बर 2020
मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष
01.मंगल-मार्गशीर्ष मास कृष्ण पक्षारम्भ। मार्गशीर्ष मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ। अशून्य शयन द्वितीया 2 व्रत।
02.बुध-सूर्य ज्येष्ठा नक्षत्र में 18/33 पर। शुक्र विशाखा नक्षत्र में 28/36 पर।
03.गुरू-संकष्टी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। चन्द्रोदय 19/36 पर। सौभाग्य सुन्दरी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक। 
07.सोम-श्री महाकाल भैरवाष्टमी। श्री महाकाल भैरव जयन्ती। सायंकाल अष्टमी में श्री भैरव जी का दर्शन पूजन। भैरव उत्पत्ति। भैरव जयन्ती। कालाष्टमी।     
08.मंगल-प्रथमाष्टमी (उड़ीसा)। बुध ज्येष्ठा नक्षत्र में 23/29 पर। 
10.गुरू-शुक्र वृश्चिक राशि में 29/17 पर।
11.शुक्र-उत्पन्ना एकादशी व्रत सबका। वैतरणी व्रत। 
12.शनि-शनि प्रदोष व्रत (पुत्रार्थियों को यह व्रत करना चाहिए)। 13 तिथि क्षय।
13.रवि-मास शिवरात्रि व्रत। शुक्र अनुराधा नक्षत्र में 21/23 पर।
14.सोम-स्नान-दान-श्राद्धादि की सोमवती अमावस्या (आज तैल-स्पर्श का निषेध है)। अन्वाधान। कमला जयन्ती। गौरीतपो व्रत। महाव्रतारम्भ।ा
मार्गशीर्ष शुक्ल पक्ष
15.मंगल-मार्गशीर्ष मास शुक्ल पक्षारम्भ। रुद्रव्रत (पीड़िया)। आधी रात के बाद पीड़िया का नदी या तालाब में विसर्जन। सूर्य की धनु संक्रान्ति एवं सूर्य मूल नक्षत्र में 21/32 पर। चन्द्र दर्शन मुहुर्त 30 साम्यर्घ। संक्रान्ति का सामान्य पुण्यकाल 15/08 से संक्रान्ति काल तक। दीप वस्त्र, दान, गोदावरी में स्नान। धनु (खर) मासारम्भ।
16.बुध-चन्द्रदर्शनम् मु.30 साम्यर्घ।
17.गुरू-रम्भा तृतीया। सतगुरू श्री गुरू गोविन्द सिंह गुरयायी। हिजरी जमादि उल अव्वल 5 माह शुरू। बुध मूल नक्षत्र धनु राशि में 11/38 पर। 
18.शुक्र-वैनायकी श्री गणेश चतुर्थी व्रत। ब्रह्मावर्त (बिठूर) में सिद्ध गणेश मंदिर में अभिषेक।
19.शनि-नागपंचमी व्रत। श्री राम विवाहोत्सव। गुह्य षष्ठी व्रत। (महाराष्ट्र में प्रसिद्ध है)। मूलक रुपिणी षष्ठी (बंगाल)। स्कन्द षष्ठी व्रत (सायंकालीन षष्ठी में)। श्री अन्नपूर्णा षष्ठी व्रत। गुरु तेग बहादुर बलिदान दिवस।
20.रवि-चम्पा षष्ठी व्रत। सन्त तारण तरण जयन्ती (जैन) मध्य प्रदेश।
21.सोम-मित्र सप्तमी। भक्त नरसिंह मेहता जयन्ती। सूर्य सायन मकर राशि में 15/33 पर। सूर्य सायन उत्तरायण। सायन शिशिर ऋतु प्रारम्भ। दैत्यों का मध्यान्ह देवताओं की मध्य रात्रि।  
22.मंगल-श्री दुर्गाष्टमी व्रत। अयन करिदिन। राष्ट्रीय पौष मासारम्भ।
23.बुध-कल्पादि नवमी। नवमी में नन्दा देवी के पूजन से विष्णु लोक की प्राप्ति।      
24.गुरू-मंगल अश्विनी नक्षत्र मेष राशि में 10/19 पर। शुक्र ज्येष्ठा नक्षत्र में 13/26 पर।
25.शुक्र-मोक्षदा एकादशी व्रत सबका। गीता जयन्ती। मौनी एकादशी (जैन)। वैकुण्ठ एकादशी। क्रिसमस डे (बड़ा दिन)। बुध पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 21/20 पर।
26.शनि-अखण्ड द्वादशी।
27.रवि-प्रदोष व्रत। अनंग त्रयोदशी व्रत।
28.सोम-पिशाच मोचन चतुर्दशी। कपर्दीश्वर दर्शन पूजन। काशी में पिशाचमोचन पर पार्वण श्राद्ध करने से पिशाच योनि से मुक्ति मिलती है। सूर्य पूर्वाषाढ़ा नक्षत्र में 23/45 पर।  
29.मंगल-व्रत की पूर्णिमा। श्री विद्या जयन्ती। दत्तात्रेय जयन्ती। श्री दत्त जयन्ती। बत्तीसी पूर्णिमा 15।
30.बुध-स्नान-दानादि की अग्रहायणी पूर्णिमा। गुरु ग्रन्थ साहब का वार्षिकोत्सव। मार्गशीर्ष मासीय व्रत-यम-नियमादि समाप्त।
पौष कृष्ण पक्ष
31.गुरू-पौष मास कृष्ण पक्षारम्भ। पौष मासीय व्रत-यम-नियमादि प्रारम्भ।

Monday, September 24, 2018

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व

पितृ पक्ष का आध्यात्मिक एवं वैज्ञानिक महत्व
    आश्विन कृष्णपक्ष प्रतिपदा से लेकर अमावस्या तक ऊपर की रश्मि तथा रश्मि के साथ पितृप्राण पृथ्वी पर व्याप्त रहता है। श्राद्ध की मूलभूत परिभाषा यह है कि प्रेत और पितर के निमित्त, उनकी आत्मा की तृप्ति के लिए श्रद्धापूर्वक जो अर्पित किया जाय वही श्राद्ध है। मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडशी-सपिण्डन तक मृत व्यक्ति की प्रेत संज्ञा रहती है। सपिण्डन के बाद वह पितरों में सम्मिलित हो जाता है।
    पितृपक्ष में पुत्र या उसके नाम से उसका परिवार जो यव (जौ) तथा चावल का पिण्ड देता है, उसमें से रेतस् का अंश लेकर वह चन्द्रलोक में अम्भप्राण का ऋण चुका देता है। ठीक आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से वह चक्र ऊपर की ओर होने लगता है। 15 दिन अपना-अपना भाग लेकर शुक्ल प्रतिपदा से उसी रश्मि के साथ रवाना हो जाता है। इसीलिये इसको पितृपक्ष कहते हैं। अन्य दिनों में जो श्राद्ध तथा तर्पण किया जाता है, उसका सम्बन्ध सूर्य की उस सुषुम्ना नाड़ी से रहता है, जिसके द्वारा श्रद्धारश्मि मध्यान्हकाल में पृथ्वी पर आती रहती है और यहाँ से तत्तत् पितर का भाग ले जाती है, परन्तु पितृपक्ष में जितने पितृप्राण चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते है, वे स्वतः चन्द्रपिंड की परिवर्तित स्थिति के कारण पृथ्वी पर व्याप्त रहते हैं। इसी कारण पितृपक्ष में तर्पण और श्राद्ध का इतना अधिक माहात्म्य है।
    प्रत्येक शरीर में आत्मा तीन रूप में व्याप्त है-1. विज्ञानात्मा, 2. महानात्मा, 3. भूतात्मा। विज्ञानात्मा (उसे कहते हैं जो) गर्भाधान से पहले स्त्री पुरूष में सम्भोग की इच्छा प्रकट करता है। वह रोदसी मण्डल से आता है। रोदसी मण्डल पृथ्वी से 27 हजार मील की दूरी पर स्थित है। महानात्मा चन्द्रलोक से पुरूष के शरीर में 28 अंशात्मक रेतस् बनकर आता है, उसी 28 अंश रेतस् से पुरूष पुत्र पैदा करता है। भूतात्मा माता द्वारा खाये गये अन्न के रस से बने वायु द्वारा गर्भ पिण्ड में प्रवेश करता है। उसे वायु में अहंकार का ज्ञान होता है। उसी को प्रज्ञानात्मा तथा भूतात्मा कहते हैं। यह भूतात्मा पृथ्वी के सिवा अन्य किसी लोक में नहीं जा सकता। मृत प्राणी का महानात्मा स्वजातीय चन्द्रलोक में चला जाता है। चन्द्रलोक में उस महानात्मा से 28 अंश रेतस् माँगा जाता है, क्योंकि चंद्रलोक से 28 अंश लेकर ही वह उत्पन्न हुआ था। इसी 28 अंश रेतस् को पितृऋण कहते हैं। 28 अंश रेतस् के रूप में श्रद्धा नामक मार्ग से भेजे जाने वाले पिण्ड तथा जल आदि के दान को ही श्राद्ध कहते है। इस श्राद्ध नामक मार्ग का सम्बन्ध मध्यान्हकाल में पृथ्वी से होता है। इसीलिए मध्यान्हकाल में श्राद्ध करने का विधान है। पृथ्वी पर कोई भी वस्तु सूर्यमण्डल तथा चन्द्रमण्डल के सम्पर्क से ही बनती है। संसार में सोम सम्बन्धी वस्तु विशेषतः चावल और यव हैं। यव में मेधा की अधिकता है। धान और यव में रेतस् (सोम) का अंश विशेष रूप में रहता है। आश्विन कृृष्णपक्ष (पितृ पक्ष) में यदि चावल तथा यव का पिण्डदान किया जाय तो चन्द्रमंडल को 28 अंश रेतस् पहुँच जाता है। पितर इसी चन्द्रमा के ऊर्ध्व देश में रहते हैं, विदूर्ध्वलोके पितरो वसन्तः स्वाधः सुधादीधित मामनन्ति। (गोलाध्याय)।
    धर्मशास्त्र का निर्देश है कि माता-पिता आदि के निमित्त उनके नाम और गोत्र का उच्चारण कर मंत्रों द्वारा जो अन्न आदि अर्पित किया जाता है, वह उनको प्राप्त हो जाता है। उन्हें गन्धर्वलोक प्राप्त होने पर भोग्यरूप में, पशुयोनि में तृणरूप में, सर्पयोनि में वायु रूप में, यक्षयोनि में पेयरूप में, दानवयोनि में मांसरूप में, प्रेतयोनि में रूधिररूप में, और मनुष्यरूप में अन्न आदि के रूप में उपलब्ध होता है।
    जब पितर यह सुनते हैं कि श्राद्धकाल उपस्थित हो गया है तो वह एक दूसरे का स्मरण करते हुए मनोमय रूप से श्राद्धस्थल पर उपस्थित हो जाते हैं और ब्राह्मणों के साथ वायु रूप में भोजन करते हैं। यह भी कहा गया है कि जब सूर्य कन्या राशि में आते हैं तो पितर अपने पुत्रों पौत्रों के यहाँ आते हैं। विशेषतः आश्विन अमावस्या के दिन वह दरवाजे पर आकर बैठ जाते हैं। यदि उस दिन उनका श्राद्ध नहीं किया जाता तो वह शाप देकर लौट जाते हैं। अतः उस दिन पत्र-पुष्प, फल और जल तर्पण से यथाशक्ति उनको तृप्त करना चाहिए। श्राद्ध से विमुख नहीं होना चाहिए। कन्या गते सवितरि पितरो यान्ति वै सुतान्। अमावस्या दिने प्राप्ते गृहद्वारं समाश्रिताः। श्राद्धाभावे स्वभवनं शापं दत्वा व्रजन्ति ते।।
    मुख्यतः श्राद्ध दो प्रकार के है। पहला एकोद्दिष्ट और दूसरा पार्वण, लेकिन बाद में चार श्राद्धों को मुख्यता दी गई। इनमें पार्वण, एकोद्दिष्ट, वृद्धि और सपिण्डीकरण आते हैं। आजकल यही चार श्राद्ध समाज में प्रचलित हैं। वृद्धि श्राद्ध का मतलब नान्दीमुख श्राद्ध है। श्राद्धों की पूरी संख्या बारह है- नित्यं नैमित्तिकं काम्य वृद्धिश्राद्ध सपिंडनम्। पार्वण चेति विज्ञेयं गोष्ठ्यां शुद्धयर्थष्टमम्।। कर्मागं नवमं प्रोक्तं दैविकं दशमं स्मृतमृ। यात्रा स्वेकादर्श प्रोक्तं पुष्टयर्थ द्वादशं स्मृतम्।।
    इनमें नित्यश्राद्ध, तर्पण और पंचमहायज्ञ आदि के रूप में, प्रतिदिन किया जाता है। नैमित्तिक श्राद्ध का ही नाम एकोद्दिष्ट है। यह किसी एक व्यक्ति के लिए किया जाता है। मृत्यु के बाद यही श्राद्ध होता है। प्रतिवर्ष मृत्युतिथि पर भी एकोद्दिष्ट ही किया जाता है। काम्य श्राद्ध, अभिप्रेतार्थ सिद्धर्य्थ अर्थात् किसी कामना की पूर्ति की इच्छा के लिए किया जाता है। वृद्धि श्राद्ध पुत्र जन्म आदि के अवसर पर किया जाता है। इसी का नाम नान्दी श्राद्ध है। सपिण्डनश्राद्ध मृत्यु के बाद दशगात्र और षोडषी के बाद किया जाता है। इसके बाद मृत व्यक्ति को पितरों के साथ मिलाया जाता है।
    प्रेतश्राद्ध में जो पिण्डदान किया जाता है, उस पिण्ड को पितरों को दिये पिण्ड में मिला दिया जाता है। पार्वण श्राद्ध प्रतिवर्ष आश्विन कृष्णपक्ष में मृत्यु तिथि और अमावस्या के दिन किया जाता है। इसके अतिरिक्त अन्य सभी पर्वों पर भी यह श्राद्ध किया जाता था। गोष्ठी श्राद्ध विद्वानों को सुखी समृद्ध बनाने के उद्देश्य से किया जाता था। इससे पितरों की तृप्ति होना स्वाभाविक है। शुद्धि श्राद्ध शारीरिक मानसिक और अशौचादि अशुद्धि के निवारण के लिए किया जाता है। कर्मांग श्राद्ध सोमयाग, पुंसवन, सीमन्तोन्नयन आदि के अवसर पर किया जाता है। दैविक श्राद्ध देवताओं की प्रसन्नता के लिए किया जाता है। यात्राश्राद्ध यात्रा काल में किया जाता है। पुष्टिश्राद्ध धन-धान्य समृद्धि की इच्छा से किया जाता है।
    धर्मशास्त्रों में श्राद्ध के सम्बन्ध में इतने विस्तार से विचार किया गया है कि इसके सामने अन्य समस्त धार्मिक कृत्य गौण से लगने लगते हैं। शास्त्रकारों ने अपने पांडित्य और मनोविज्ञान का यत्परोनास्ति रूप प्रदर्शित किया है। जब घर में कोई नयी समृद्धि या मांगलिक उत्सव हो तो उस समय अपने स्वर्गीय जनों की याद आना नितांत स्वाभाविक है। जो कभी हमारे सुख, दुःख में सम्मिलत होते थे, उनकी स्मृति मिटाए नहीं मिटती। अतः यह इच्छा स्वाभाविक है कि वह अज्ञात लोक के वासी भी हमारे आनन्दोत्सव में सम्मिलित हों, शरीर से न सही, आत्मा से हमारे साथ रहें, अतः उनके प्रति श्रद्धावनत होना स्वाभाविक है। उनका शास्त्रीय मंत्रों द्वारा मानसिक आवाहन, पूजन ही श्राद्ध है।
    इस सत्य से इनकार नहीं किया जा सकता कि मन की भावना बड़ी प्रबल होती है। श्रद्धाभिभूत मन के सामने स्वर्गीय आत्मा सजीव और साकार हो उठती है। श्राद्ध में माता-पिता आदि के रूप का ध्यान करना आवश्यक कर्तव्य निर्धारित किया गया है। लोगों का यह अनुभव है कि श्राद्ध के समय माता-पिता, पिता या किसी अन्य स्नेही की झलक दिखाई दी। आज का मनोविज्ञान भी श्राद्ध के इस सत्य के निकट पहुँचता जा रहा है।
    श्राद्ध के लिए जिन वस्तुओं की आवश्यकता होती है। उनपर भी शास्त्रों में बहुत विचार किया गया है। कौन वस्तु कैसी हो, कहाँ से ली जाय, कब ली जाय। भोजन सामग्री कैसी हो, किन पात्रों में बनायी जाय, कैसे बनायी जाय। फल, साग, तरकारी आदि में भी कुछ अश्राद्धीय ठहरा दी गयी है। प्रत्येक वस्तु की शुद्धता और स्तर निर्धारित कर दिया है। पुष्प और चन्दन जो निर्धारित है, उन्हीं का उपयोग हो सकता है।
    इसके अलावा श्राद्ध में कैसे ब्राह्मणों को आमन्त्रित किया जाय, किस प्रकार किया जाय, कब किया जाय और निमन्त्रित ब्राह्मण निमन्त्रण के बाद किस तरह का आचरण करें, भोजन किस प्रकार करें, आदि सभी बातें विस्तार पूर्वक बतलायी गयी हैं। ब्राह्मणों को, उत्तम, मध्यम और अधम तीन श्रेणियों में विभाजित किया गया है। निषिद्ध ब्राह्मणों की सूची बड़ी लम्बी है। शास्त्र का कठोर आदेश है कि अन्य किसी धार्मिक कार्य में ब्राह्मणों की परीक्षा न की जाय, पर श्राद्ध में जिन ब्राह्मणों को आमन्त्रित करना हो, उनकी परीक्षा अवश्य की जाय और परीक्षा आमन्त्रित करने के पूर्व की जाय, बाद में नहीं- न ब्राह्मणं परीक्षेत देवै कर्मणि धर्मवित्। पित्रये कर्मणि तु प्राप्ते परीक्षेत प्रयत्नतः।
    उशनाः - भोजनं तु निःशेषं कुर्यात् प्राज्ञः कथन्चन।
        अन्यत्र दध्नः क्षीराद्वा क्षौद्रात्सक्तुभ्य एव च।।
    उशना ने कहा है - बुद्धिमान व्यक्ति कभी निःशेष भोजन न करे। अर्थात्-थाली में कुछ अवश्य छोड़ दे। लेकिन दधि, दूध सहत और सत्तु को नहीं छोड़ना चाहिए।
    ब्राह्मे - न चाश्रु पातयेज्जातु    न शुष्कां गिरमीयेत्।
        न चोद्विक्षेत् भुन्जानान न च कुर्वीत मत्सरम्।।
    ब्रह्मपुराण में कहा है - आँसू को न गिरावे। न रूखी वाणी कहे। भोजन करते हुए ब्राह्मणों को न देखें और न मत्सर ( डाह, ईर्ष्या ) करे।
    यमः -- स्वाध्यायं श्रावयेत्सम्यक् धर्मशास्त्राणि चैव हि।
    यम ने कहा है -- वेद और धर्मशास्त्रों को अच्छी प्रकार से सुनावे।
    गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने    कश्यपं गोत्रमुच्यते।
    तस्मादाह श्रुतिः सर्वाः प्रज्ञाः कश्यपसंभवाः।।
    वहीं पर चन्द्रिका में स्मृत्यन्तर का वचन है कि - गोत्र के अपरिज्ञान में कश्यप गोत्र कहा है। इसीलिए श्रुति ( वेद ) ने कहा है कि - जितनी प्रजा हैं वे सब कश्यप से पैदा हुई है। यह व्यवस्था उनके लिए है जिन्हें अपना गोत्र नहीं मालूम है।
    श्राद्ध किसी दूसरे के घर में, दूसरे की भूमि पर कभी न किया जाय। जिस भूमि पर किसी का स्वामित्व न हो, सार्वजनिक हो, ऐसी भूमि पर श्राद्ध किया जा सकता है। शास्त्रीय निर्देश है कि दूसरे के घर में जो श्राद्ध किया जाता है, उसमें श्राद्ध करने वाले पितरों को कुछ नहीं मिलता। गृह-स्वामी के पितर बलात् सब छीन लेते हैं - परकीय गृहे यस्तु स्वात्पितृस्तर्पयेद्यदि। तद्भूमि स्वामिनस्तस्य हरन्ति पितरोबलात्।।
    यह भी कहा गया है कि दूसरे के प्रदेश में यदि श्राद्ध किया जाय तो उस प्रदेश के स्वामी के पितर श्राद्धकर्म का विनाश कर देते हैं- परकीय प्रदेशेषु पितृणां निवषयेत्तुयः। तद्भूमि स्वामि पितृभिः श्राद्धकर्म विहन्यते।।
    इसीलिए तीर्थ में किये गये श्राद्ध से भी आठगुना पुण्यप्रद श्राद्ध अपने घर में करने से होता है-तीर्थादष्टगृणं पुण्यं स्वगृहे ददतः शुभे। यदि किसी विवशता के कारण दूसरे के गृह अथवा भूमि पर श्राद्ध करना ही पड़े तो भूमि का मूल्य अथवा किराया पहले उसके स्वामी को दे दिया जाय।
    मृतक की अन्त्येष्टि और श्राद्ध की जो व्यवस्था इस समय प्रचलित है, वह हमारे वेदों में वर्णित है। गृह्यसूत्रों में पितृयज्ञ अथवा पितृश्राद्ध का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। आश्वलायन गृह्मसूत्र की सातवीं और आठवीं कण्डिका में विस्तार पूर्वक श्राद्ध विधि वर्णित की गयी है, मूलतः वेदों में भी श्राद्ध और पिण्डदान का उल्लेख किया गया है। श्राद्ध में जो मंत्र पढ़े जाते हैं, उनमें से कुछ ये हैं अत्र पितरो मादमध्वं यथाभागमा वृषायध्वम। इस पितृयज्ञ में पितृगण हृष्ट हो और अंशानुसार अपना-अपना भाग ग्रहण करें। नम वः पितरो रसाय। नमो वः पितरो शोषाय। पितरों को नमस्कार ! बसन्त ऋतु का उदय होने पर समस्त पदार्थ रसवान हों। तुम्हारी कृपा से देश में सुन्दर बसन्त ऋतु प्राप्त हो। पितरों को नमस्कार ! ग्रीष्म ऋतु आने पर सर्व पदार्थ शुष्क हों। देश में ग्रीष्म ऋतु भलीभाँति व्याप्त हो।
    इसी प्रकार छहों ऋतुओं के पूर्णतः सुन्दर, सुखद होने की कामना और प्रार्थना की गयी है। यह भी कहा गया है कि पितरों, तुम लोगों ने हमको गृहस्थ (विवाहित) बना दिया है, अतः हम तुम्हारे लिए दातव्य वस्तु अर्पित कर रहे हैं।
    वेदों के बाद हमारे स्मृतिकारों और धर्माचार्यों ने श्राद्धीय विषयों को बहुत व्यापक बनाया और जीवन के प्रत्येक अंग के साथ सम्बद्ध कर दिया। मनुस्मृति से लेकर आधुनिक निर्णय सिन्धु, धर्मसिन्धु तक की परम्परा यह सिद्ध करती है कि इस विधि में समय समय पर युगानुरूप संशोधन, परिवर्धन व परिवर्तन होता रहा है। नयी मान्यता, नयी परिभाषा, नयी विवेचना और तदनुरूप नई व्यवस्था बराबर होती रहती है। दुर्भाग्य की बात यह है कि विदेशी आधिपत्य के बाद जब हिन्दु समाज पंगु हो गया, समाज का नियन्त्रण विदेशी पद्धति और विधि-विधान से होने लगा तो युग की आवश्यकता के अनुरूप नयी परिभाषा, व्यवस्था का क्रम भी अवरूद्ध हो गया, फलस्वरूप उपयोगितावादी मानव मन की तुष्टि अपने पुरातन संस्कारों से नहीं हो पा रहीं है और वह संस्कार विहीन होता जा रहा है। जीवित माता पिता, बंधु-बाधव भी आज मात्र उपयोगितावादी की कसौटी पर कसे जा रहे हैं, तब माता-पिता के प्रति आस्था, श्रद्धा और भक्ति की तो बात ही क्या ! इतना ही नहीं, हमारी आस्था स्वयं अपने घर से डिगती जा रही है। देश में व्याप्त समस्त अशान्ति, विक्षोभ, असंतोष, अनैतिकता आदि का मूल कारण यही है।  जब हम स्वयं अघोर नहीं है तो अघोराः पितरः सन्तु की कामना कैसे कर सकते है।
संकलन- ऋद्धि विजय त्रिपाठी